काली मिर्च की खेती (Black Pepper) मे अधिकतम उत्पादन एवं फसल सुरक्षा हेतु ध्यान देने योग्य विशेष बिन्दु।

काली मिर्च (पाइपर नाइग्रम) एक बहुवर्षीय वेल है, जो पाईपरेसी परिवार से सम्बन्धित है । इसके छोटे गोल फल, मसाले और औषधी दोनों रूपों में इस्तेमाल किए जाते हैं । वाणिज्यिक रूप से काली मिर्च और सफेद मिर्च बाजार में मिलती है ।

पके फलों को वैसे ही सूखाकर काली मिर्च तैयार की जाती है और सफेद मिर्च अच्छी तरह पके हुए फलों की बाहरी त्वचा हटाने के बाद उसे सूखाकर तैयार की जाती है ।

काली मिर्च का प्रयोग मसाले के रूप में विभिन्न खाद्य पदार्थों को तैयार करने में तथा औषधी के रूप में होता है । पूरे विश्व में काली मिर्च के उत्पादन, उपयोग और निर्यात में भारत अग्रणी देश है । काली मिर्च का उत्पादन मुख्यता केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में ज्यादा होता है ।

काली मिर्च की खेती के लिए जलवायु और मिट्टी भूमि और जलवायु

काली मिर्च एक आर्द्र उष्णकटिबंधीय क्षेत्र का पौधा है, जिसके लिए पर्याप्त वर्षा औरआर्द्रता की आवश्यकता होती है । पश्चिमी घाट के पहाड़ों के निम्न तटों की गर्म तर जलवायु इसकी खेती के लिए उपयुक्त है । 20 0 उत्तरी और दक्षिणी अक्षाँश पर और समुद्र तट से 1500 मी. तक की ऊँचाई पर इसकी खेती सफलतापूर्वक की जाती है तथा 10 से 40 0 सेन्टीग्रेड तक का तापमान इसके लिए अनुकूल है । 125-200 से.मी. की वार्षिक वर्षा काली मिर्च के लिए उपयुक्त है । यद्यपि प्राकृतिक रूप से काली मिर्च लाल दोमट मिट्टी में अच्छी पैदा होती है, फिर भी 4.5 से 6.0 तक ph वाली मिट्टी में भी इसे पैदा किया जा सकता है ।

भारत के पश्चिमी तट में काली मिर्च निन्मलिखित क्षेत्रों में पैदा की जाती है ।

(1) तटवर्ती क्षत्रे जहां  काली मिर्च घरेलू आवश्यकताओं के लिए गृह वाटिका में पैदा की जाती है
(2) तराइयों में जहाँ काली मिर्च की व्यापक खेती की जाती है ।
(3) समुद्र तट से 800-1500 मी. तक की ऊँचाई के पहाड़ी क्षेत्रों में जहां कॉफी, इलायची और चाय बागानों में उगाए गए छायादार वृक्षों पर उसकी खेती की जाती है और
(4) कन्नूर, कासरगोड, दक्षिण कन्नड और उत्तर कन्नड जिलों में इसकी खेती की जाती है ।

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काली मिर्च की किस्में

काली मिर्च की अधिकांश किस्में मोनोशियस (monoecious) प्रकृति की (नर व मादा फूलों का एक  ही बेल पर उगना) है । तथापि पूर्ण रूपेण नर से लेकर पूर्ण रूपेण मादा बेल भी पाई जाती है । भारत में काली मिर्च की 75 से अधिक किस्मों की खेती की जाती है । केरल में सबसे प्रसिद्ध किस्म करिमुण्डा है । कोट्टानाडन (दक्षिण केरल), नारायाकोडी (मध्य केरल), एम्पिरियन (वयनाडु), नीलामुण्डी (इडुक्की), कुतिरावल्ली (कालीकट और इडुक्की), बेलानकोट्टा, काल्लुवल्ली (उत्तर केरल), मल्लिगेसरा और उदेकरा (कर्नाटक) अन्य प्रमुख किस्में हैं । कुतिरावल्ली और बेलानकोट्टा में एकांतर वर्षों में उपज अधिक है ।

काली मिर्च की प्रमुख प्रजातियाँ पन्नियूर-1, पन्नियूर-2, पन्नियूर-3, पन्नियूर-4, पन्नियूर-5, पन्नियूर-6 (केरल कृषि विश्वविद्यालय द्वारा अनुमोदित) और शुभकरा, श्रीकरा, पेंचमी, पोर्णमी, शक्ति, तेवम, गिरीमुण्डा मलवार एक्सेल (भारतीय मसाले फसल अनुसंधान संस्थान, कालिकट द्वारा अनुमोदित) आदि हैं । गुणवत्ता की दृष्टि से, कोट्टानाडन में सबसे ज्यादा तेल (17.8%) में पाया जाता है ।

प्रवर्धन

काली मिर्च की बेल में तीन प्रकार की शाखाएं विकसित होती हैं :

(1) प्राथमिक तना जिसमें लम्बी अर्न्तगांठे (long internode) होती हैं तथा इसमें जड़े निकलती हैं ।

(2) बेल के निचले भाग से निकलने वाली रनर (runner) शाखाएं जिन में लम्बी अर्न्तगांठ (long internode) होती है और हर गांठ से जड़े निकलती हैं ।

(3) पार्श्र्व शाखाएं जिस पर फसल उगती हैं ।

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साधारणतया पौध सामग्री के लिए रनर (runner) शाखाओं  से ज़ड़ कलमें (cutting) ली जाती है, हालांकि उसी शाखाओं (terminal Shoots) का प्रयोग भी प्रवर्धन के लिए किया जा सकता है । पार्श्र्व शाखाओं से ली गई जड़ कलमों का प्रयोग काली मिर्च के झाड़ी नुमा (bush pepper) पौधे तैयार करने के लिए होता है ।

अधिक उपज देने वाली स्वस्थ बेलों का चुनाव मातृ बैल (mother vine) के रूप में किया जाता है । इन से निकलने वाली रनर शाखाओं (runner) को मिट्टी के सम्पर्क में आकर जड़े विकसित करने से रोकने के लिए इन्हें बेल के आधार पर पास लगाए गए लकड़ी के खूंटों के गिर्द लपेटा जाता है ।

फरवरी-मार्च में रनर शाखाओं को बेलों से अलग किया जाता है और पत्तों की कटाई के बाद 2-3 गांठों वाली कलमों को पौधशाला की क्यारियों में या रोपण/पोटिंग मिश्रण (मिट्टी, गोबर व रेत को 2:1:1 के अनुपात में मिलाकर बनाय गया रोगण मिश्रण) से भरे हुए पोलिथीन के बैग/लिफाफों में रोपा जाता  है । पोलिथीन बैगों को पर्याप्त छाया मिलनी चाहिए और आवश्यकतानुसार उन्हें सिंचाई करते रहना चाहिए । मई-जून में कलमें खेत में रोपाई के लिए तैयार हो जाती हैं ।

सर्पेन्टाइन विधि (Serpentine method)

काली मिर्च के प्रवर्धन की यह सबसे सस्ती विधि है, जिसमें छायादार पौधशाला शैड में लगभग 500 ग्राम रोपण मिश्रण को 20×10 से.मी. आधार के पोलीथीन बैग में भरते हैं और उसमें मातृ बेल को रोपते हैं । बेल की बढ़वार के साथ उसे कुछ गांठे (nodes) निकल आती हैं । हर गांठ के नीचे रोपण मिश्रण से भरे हुए पोलीथीन बैग रख कर, नारियल पत्तों की मध्य शिरा की सहायता से गांठ को रोपण मिश्रण में दबा कर रखते हैं । यह प्रक्रिया तीन महीने तक जारी रखें तब तक 10-15 एकगांठी जड़ कलमें तैयार हो जाती हैं । जब 20 गांठों में जड़ें आ जाती हैं तो पहले 10 पोलीथीन बैग जिनमें जड़दार गांठों का विकास हो चुका है उन गांठों को काट कर अलग कर लेते हैं तथा उन्हें बैग में दबा देते हैं । हर बैग में पनप रही गांठ से कक्षीय कलिका (axillary bud) का अंकुरण होता है व 2-3 महीने में 4-5 गांठों वाली कलमें तैयार हो जाती हैं । और 20-30 दिनों के बाद, बचे हुए बैगों की गांठों को भी काट कर अलग कर लेते हैं तथा पहले की तरह बैग में दबा देते हैं। इन पोलीथीन बैगों में प्रतिदिन आवश्यकतानुसार सिंचाई अवश्य करनी चाहिए । इस विधि के द्वारा एक साल में प्रत्येक मातृबेल से लगभग 30-40 जड़दार कलमें बाग में रोपण के लिए तैयार की जा सकती हैं ।

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काली मिर्च की खेती में पौधशाला के रोग

फाइटोफ्थोरा संक्रमण (phytophthora infection)

फाइटोफ्थोरा संक्रमण पौधशाला में कलमों के पत्ते, तने व जड़ों में देखा जा सकता है । पत्तों में टेढ़े हाशिए वाले काले धब्बे दिखाई देते हैं, जो तेजी से फैलते हैं और पत्ते झड़ जाते हैं । तने का संक्रमण काले धब्बे के रूप में दिखाई देता है जिसके परिणाम स्वरूप तना झुलस जाता है । जड़ों पर इसके लक्षण पूरे जड़ तंत्र के सड़ने की तरह प्रतीत होते हैं ।

1% बोर्डो मिश्रण के छिड़काव और 0.2% कोप्पर ओक्सिक्लोराइड से मासिक अंतराल पर मिट्टी उपचारित (drenching) करने से इस रोग को रोका जा सकता है । या 0.01%  मेटालाक्सिल (रिडोमील-मैन्कोजेब के 1.25 ग्राम एक लीटर पानी में) या 0.3% पोटिशियम फोसफोनेट का प्रयोग भी किया जा सकता है  पोट्टिंग मिश्रण का निर्जमीकरण करने के लिए मीथाइल ब्रोमाइड से धूमित या काले पालीथीन शीट से सौरीकरण करना चाहिए । पौधशाला के पोलिथीन बैगों में पोट्टिंग मिश्रण भरते समय निर्जमीकृत मिश्रण से VAM 100 सी सी / कि.ग्राम की दर से और ट्राइकोडर्मा 1 ग्राम / कि.ग्राम मिट्टी की दर से जैविक नियंत्रक इसमें मिला सकते हैं । जैविक नियंत्रक केवल जड़ तंत्र को ही बचाता है, तने शाखाओं आदि उपरी भागों को बचाने के लिए रसायनों का प्रयोग से संरक्षित करना चाहिए । यदि बोर्डो मिश्रण का प्रयोग करें तो मिट्टी में इस फफूँद नाशक की बूंदे नहीं गिरनी चाहिए । या मोटालाक्सिल एवं पोटाश्यिम फोसफोनेट जैसे फफूँद नाशक जो ट्राइकोडर्मा के लिए हानिकारक नहीं होते हैं, उनका प्रयोग किया जा सकता है ।

एन्थ्राकनोज (Anthracnose)

यह रोग कोलटोट्राइकम ग्लोइयोस्पोरिडस नामक फफूँद के कारण होता है । ये फफूँद पत्तों को संक्रमित करती है और पत्तों में पीले-भूरे के क्लोरोटिक आवरण वाले अनियमित बिन्दियाँ बनाती है । 1% बोर्डो मिश्रण और 0.1% कार्बन्डाज़िम का एक के बाद एक छिड़काव से इस रोग का नियंत्रण किया जा सकता है ।

पत्ते गलन और झुलसा (leaf rot and blight)

यह रोग साइज़ोक्टोनिया सोलनाई के कारण होता है और अप्रैल-मई में जब गर्म तर स्थितियाँ विद्यमान होती हैं, तब पौधशाला में इस रोग का संक्रमण तीव्र  होता है । ये फफूँद पत्ते एवं तने को संक्रमित करताहै तथा भूरे रंग की गहरी बिन्दियाँ और माइसीलियल (mycelia) धागे पत्तों में दिखाई देते हैं और संक्रमित पत्ते साइसीलियल धागों से एक दूसरे से जुड़े रहते हैं । तनों पर इसका संक्रमण गहरे भूरे रंग में ऊपर से नीचे फैलने वाले धब्बे के रूप में दिखाई पड़ता है । संक्रमण के कारण नए कल्ले (new flushes) धीरे धीरे मुरझाकर सूख जाते हैं । कोलटोट्राइकम से होने वाले पत्र-दाग, नेक्रोटिक बिन्दुओं के चारों ओर पीले परिवेश से दिखाई पड़ते हैं । 1% बोर्डो मिश्रण के छिड़काव से इन दोनों रोगों को नियंत्रित किया जा सकता है ।

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आधार उखटा रोग (Basal wilt)

यह रोग साधारणतः जून-सितंबर में पौधशाला में देखने को मिलता है और य स्क्लीरोटियम रोलेफसी फफूँद के कारण होता है । तने व पत्तों में भूरे रंग के धब्बे दिखाई पड़ते हैं । पत्तों में इन धब्बों पर सफेद माइसीलियम (mycelium) नजर आते हैं । ये माइसीलियम के धागे बाद में तने पर घाव पैदा करते हैं । पत्ते मुरझा जाते हैं और संक्रमण अधिक होने पर जड़ कलमें सूख जाती हैं ।  पुराने धब्बों में सफेद व क्रीम रंग के छोटे गोलाकार के स्कलेरोशिया (Selerotia) दिखाई पड़ती है । रोग से प्रभावित कलमों और झड़े हुए पत्तों को काटकर नष्ट कर देना चाहिए । बाद में सभी कलमों पर 0.2% कार्बन्डाज़िम या 1% बोर्डो मिश्रण का छिड़काव करना चाहिए ।

विषाणु संक्रमण (Viral infection)

वेन किल्यरिंग, मोज़ेक, पीली चित्ती, मोट्टिंलिंग, छोटी पत्ती आदि पौधशाला में दिखना विषाणु संक्रण की निशानी है । विषाणु सिस्टेमिक प्रकृति के होने के कारण इनका प्राथमिक फैलाव पौध रोपण सामग्रियों के जरिए होता है, क्योंकि काली मिर्च का प्रवर्धन काण्डों के द्वारा किया जाता है । जब रोग संक्रमित पौधों से रोपण सामग्री ली जाती है, तब जड कलमें भी संक्रमित हो जाती हैं । इसलिए विषाणुमुक्त मातृ पौधों का चयन करना अत्यंत आवश्यक है । इसके अतिरिक्त, रोग का फैलाव एफिड्स, मीली  बग आदि कीटों द्वारा होता है पौधशाला में कलमों को अधिक पास-पास उगाने से  इन कीटों के आक्रमण की संभावना अधिक होती है । इसलिए जब इन कीटों को पौधशाला में पाया जाता है, तब पौधशाला में डाइमेथेएट या मोनेक्रोटोफोस 0.05% की दर पर छिड़काव करना चाहिए । साथ ही, नियमित देख-रेख करके संक्रमित पौधों को हटाना भी आवश्यक है ।

पौधशाला में सूत्र कृमियों का संक्रण (Nematode infestations)

पौधशाला  में पौधों को प्रभावित करने वाले सूत्र कृमियों में जड़ गाँठ सूत्र कृमि यानि root knot nematode (मेलोडोगायनी स्पी.) और छेद करने वाले सूत्र कृमि यानि burrouing nematode (रोडोफोलस सिमिलिस) प्रमुख हैं। सूत्र कृमियों के संक्रमण के लक्ष्ण बढ़वार कम होना, पत्तों का पीलापन और पत्तों की शिराओं के बीच पीलापन आदि होते हैं । सूत्र कृमियों से प्रभावित कलमों की खेतों में रोपाई करने पर कलमों की बढ़वार बहुत कम होती है और बाद में कलमें धीरे धीरे मर जाती हैं । सूत्र कृमि रहित जड़ कलमों का उत्पादन करने के लिए धूम्रित रोपण मिश्रण (fumigated potting mixture) का प्रयोग करना चाहिए । रोपण मिश्रण के 48 घंटे तक पोलिथीन बैगों में 500 ग्राम /100 ड़ढद्य मिट्टी की दर से मीथैल बोमाइड से धूम्रित करना चाहिए या 2% फोर्मालिन से अच्छी तरह गीला करना चाहिए । 48 घंटे के बाद पोलिथीन शीट हटानी चाहिए और विषैली गैस निकालने के लिए इस मिश्रण को अच्छी तरह ऊपर नीचे पलटना चाहिए । धूम्रित करने के 2-3 हफ्ते बाद मिट्टी का यह मिश्रण रोपाई के लिए प्रयोग किया जा सकता है । रोपण मिश्रण का निज्रमीकरम करने के लिए मिट्टी का सौरीकरण भी किया जा सकता है । सूत्र कृमियों के संक्रमण को रोकने के लिए रोग निवारक उपाय के रूप में सूत्र कृमियों के संक्रमण को रोकने के लिए रोग निवारक उपाय के रूप में सूत्र कृमिनाशक का प्रोग भी आवश्यक है । इसके लिए बैगों में कलमों के चारों और समान दूरी पर 2-3 से.मी. गहरी छिद्र बनाकर इनमें 10 ग्राम फोरेट 1 ग्राम/बैग की दर से या 3 ग्राम कारबोफुरान 3 ग्राम प्रति बैग की दर से रखना चाहिए और मिट्टी से ढक देना चाहिए । मिट्टी में पर्याप्त नमी बनाई रखने के लिए हल्की सिंचाई भी करनी चाहिए ।

बागानों की स्थापना

काली मिर्च की खेती के लिए खेत की तैयारी किस तरह से करे?

काली मिर्च की खेती ढलान पर की जाती है, दक्षिण दिशा की ओर वाली ढलान को नहीं चुनना चाहिए और उत्तर एवं उत्तर पूर्वीं ढलानों के निचले भागों को चुनना चाहिए ताकि गर्मी में काली मिर्च की बेलों को सूर्य की तेज धूप के दुष्प्रभाव से बचाया जा सके ।

भूमि की तैयारी और आधार की रोपाई

मई-जून में पहली वर्षा होने पर एरिथ्रीना स्पी. (Erythrina Sp.) गरुगा पिन्नेटा (Garuga Pinnata) या किलिन्जिल अथवा ग्रोविल्लिया रोबस्टा (Grevillea robusta) या सिल्वर ओक की तने की कलमों (Stem cutting) को गोबर और ऊपरी मिट्टी से भरे हुए 50 से.मी. x 50 से.मी. x 50 से.मी. आकार वाले गड्ढों में 3 से.मी. x 3 से.मी. की दूरी पर रोपा जाना चाहिए और इस तरह एक हेक्टेयर में1111आधारों (standards) की रोपाई की जा सकती है । एलियान्थस मलबारिका (Alianthus malabarica) के पौधे भी रोपित किए जा सकते हैं । 3 वर्ष के बाद जब काली मिर्च की बेलें काफी लम्बी हो जाती हैं तब इनको आधारों पर चढ़ाया जा सकता है । आधार के रूप में एरिथ्रीना इन्डिका (E. Indica) का प्रयोग करते समय सूत्र कृमियों और तने व जड़ छेदकों के नियंत्रण के लिए फोरेट 10 जी 30 ग्राम की दर सेसाल में दो बार मई-जून और सितम्बर-अक्तूबर में प्रयोग करना चाहिए । जब एरिथ्रीना इन्डिका (E. Indica) और गरुगा पिन्नेटा (G. pinnata) का इस्तेमाल करते हैं तो, प्रारंभिक तने को मार्च-अप्रैल में काटकर छाया में ढेर लगाकर रखना चाहिए । मई में इन तनों में अंकुरण होने लगता है । काली मिर्च की बेलों की रोपाई करने के लिए बने गए गड्ढों के किनारे पर इन तनों की रोपाई की जाती है ।

काली मिर्च की खेती के लिए रोपाई किस प्रकार और कब करे

मानसून शुरू होने पर हर आधारों के उत्तरी दिशा की ओर गड्ढों में काली मिर्च के 2-3 जड़ कलमों की रोपाई की जाती है ।

कृषि क्रियायें

कलमें बढऩे के साथ साथ, जहाँ आवश्यक हो वहाँ शाखाओं को आधार से बाँधना चाहिए । गर्मी में कृत्रिम छाया देकर तरुण बेलों को धूप से बचाना चाहिए । बेलों को अनुकूल प्रकाश देने के लिए ही नहीं बल्कि आधारों की सीधी बढ़वार के लिए भी शाखाओं की काट-छाँट करना आवश्यक है ताकि मानसून के दौरान पर्याप्त छाया मिल सके । उत्तरी-पूर्वी मानसून समाप्त होने के साथ हरे पत्तों या कार्बनिक सामग्रियों से पलवार करना चाहिए । जड़ों को नुकसान से बचाने के लिए बेलों के तल को सुरक्षित रखना चाहिए ।

दूसरे वर्ष भी इसी तरह की कृषि क्रियायें दोहरानी चाहिए । चौथे वर्ष से आधारो की काट-छाँट सावधानी से करनी चाहिए ताकि आधारों की लम्बाई को नियमित किया जा सकें और बेलों को अनुकूल छाया दी जा सके । फूल एवं फल लगते समय अधिक छाया होने से न केवल कीट संक्रमण ज्यादा हो जाता है बल्कि उत्पादन भी कम हो जाता है । चौथे वर्ष से लेकर, सामान्यतः दो बार हल्की खुदाई करते हैं, प्रथम मई-जून में और दूसरी बार दक्षिणी-पश्चिमी मानसून की समाप्ति के साथ । बरसात में भूमि कटाव को रोकने के लिए केलप्पोगोनियम मुकुनोइडस (calapogonium mucunoides) और मैमोसा इन्विसा (Mimosa invisa) को आवरण फसल (cover crop) के रूप में प्रयोग करना चाहिए । ये घने कार्बनिक पलवार के रूप में भी काम आती हैं ।

काली मिर्च की खेती में खाद एवं उर्वरक की मात्रा एवं प्रयोग

लेटेराइट मिट्टी में रोपित काली मिर्च की बेलों में प्रति वर्ष 100 ग्राम नत्रजन, 40 ग्राम फोसफोरस, 140 ग्राम पोटाश की दर से उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए । प्रथम वर्ष में इसकी एक तिहाई मात्रा का और दूसरे वर्ष में दो तिहाई मात्रा प्रयोग करनी चाहिए ।

उर्वरकों की पूरी मात्रा का प्रयोग तीसरे वर्ष से करना चाहिए । उर्वरकों का प्रयोग विभाजित करके एक हिस्सा मई-जून और दूसरा अगस्त-सितम्बर में प्रयोग करना चाहिए । उर्वरकों का प्रयोग बेलों के चारों ओर 30 से.मी. की दूरी पर करना चाहिए और इसको अच्छी तरह मिट्टी से ढक देना चाहिए । उर्वरकों को काली मिर्च के जड़ों से सीधे सम्पर्क में आने से रोकना चाहिए । मई में गोबर या कम्पोस्ट के रूप में कार्बनिक खाद 10 कि. ग्राम प्रति बेल की दर से प्रयोग करनी चाहिए । नीम की खली 1 कि. ग्राम प्रति बेल की दर से प्रयोग कर सकते हैं । अप्रैल-मई में चूना 600 ग्राम प्रति बेल की दर से एकांतर वर्षों में प्रयोग करने की भी सिफारिश की जाती है ।

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पौध संरक्षण

काली मिर्च की खेती में लगने वाले रोग

पाद गलन रोग (Food rot disease)

काली मिर्च को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाने वाले रोगों में फाइटोफ्थोरा पाद गलन रोग प्रमुख है और इसके संक्रमण दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के दौरान अधिक होता है । बेल के सारे भाग इस रोग से प्रभावित होते हैं तथा स्थान व बेल के संक्रमित भाग के आधार पर रोग के लक्षण दिखाई देते हैं ।

लक्षण

पत्तों पर एक या अधिक काले धब्बे पड़ जाते हैं जो शीघ्र बड़े हो जाते हैं जिसके कारण पत्ते झड़ जाते हैं ।

इस रोग के संक्रमण से कोमल पत्तियाँ और नई उग रही रनर (runner) शाखाऐं जो जमीन पर आगे बढ़ रही हैं उनके रसीले ऊपरी भाग काले हो जाते हैं । बीच-बीच में होने वाली वर्षा की बौछारों के द्वारा यह रोग संक्रमित पत्ते और रनर शाखाओं से पूरी बेल में फैल जाता है ।

यदि जमीन के निकट के मुख्य तने के भाग को नुकसान हो जाए तो पूरी बेल मुरझा जाती है । तत्पश्चात काले धब्बे युक्त या धब्बे रहित पत्ते व फूलों के गुच्छे झड़ जाते हैं । गाँठ से शाखाएँ टूट जाती हैं और एक महीन में पूरी बेल खत्म हो जाती है ।

यदि नुकसान पोषक जड़े (feeder root) तक सीमित है तो वर्ष की समाप्ति तक इसके लक्षण दिखाई नहीं देते हैं और बेलों में पीलापन, मुरझाना, पतझढ़ और बेल के कुछ भाग के सूख जाने के रूप में पतन के लक्षण नजर आते हैं । अक्तूबर-नवम्बर से यह स्थिति दिखाई पड़ती है । वर्षा के बाद ये बेल रोग से उबर जाती है और दो से अधिक ऋतुओं तक जीवित रहती है जब ज़ों का संक्रमण चरम सीमा पर पहुंचकर कालर (collar) सड़न में बदल जाता है तब पूरी बेल मर जाती है ।

काली मिर्च की फसल में रोग उत्पन हो जाते है या कीट लग जाते है उनकी सुरछा हम किस प्रकार से करे?

एकीकृत रोग प्रबन्धन रणनीतियों को अपनाकर इस रोग को नियंत्रित किया जा सकता है ।

फाइटोसेनिटेषन (Phyto-sanitation)

फफूँद की वृद्धि रोकने के लिए बागों में मृत बेलों को जड़ों समेत उखाड़ कर नष्ट करना चहिए ।

रोग मुक्त बागों से ही रोपण सामग्री लेनी चाहिए और धुम्रित या सौरीकृत मिट्टी में उगाई गई पौध ही लेनी चाहिए ।

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कृषि क्रियाएँ

पानी के जमाव को कम करने के लिए पर्याप्त जल निकास सुनिश्चित कराना चाहिए ।

मिट्टी खोदने जैसी कृषि क्रियाओं के कारण जड़ तंत्र को नुकसान नहीं होने चेना चाहिए ।

नई उग रही रनर शाखाओं को जमीन के सहारे नहीं बढ़ने देना चाहिए । इन्हें या तो आधार से बाँधना चाहिए या काट देना चाहिए ।

आधार वृक्षों  की अनावश्यक शाखाओं को मानसून शुरू होने से पहले ही काट देना चाहिए ताकि बेलों को अच्छी धूप मिल सके तथा नमी की अधिकता न होने पाए । कम नमी एवं अच्छी धूप होने से पत्तों पर रोग का संक्रमण कम किया जा सकता है ।

रासायनिक नियंत्रण

रासायनिक नियंत्रण के नीचे दिये गए किसी भी उपाय को अपनाया जा सकता है ।

मई-जून में कुछ मानसून वर्षा के बाद सभी बेलों के थालों को 45-50 से.मी. के ब्यास में 0.2% कोप्पर ओक्सीक्लोराईड 5-10 लीटर प्रति बेल की दर से उपचारित करना चाहिए । पत्तों पर 1% बोर्डो मिश्रण का छिड़काव भी करना चाहिए । दोनों क्रियाओं को अगस्त-सितम्बर में दोहराना चाहिए । यदि अक्तूबर में मानसून जारी रहे तो तीसरी बार यह दोनों उपचार करने चाहिए ।

मानसून की कुछ वर्षा होने के बाद सभी बेलों के थालों को 0.3% पोटाशियम फोसफोनेट 5-10 लीटर प्रति बेल की दर से उपचारित करना चाहिए । पत्तों पर 0.3% पोटाशियम फोसफोनेट का छिड़काव करना चाहिए । दोनों क्रियाओं को अगस्त-सितम्बर में दोहराना चाहिए । यदि अक्तूबर में मानसून जारी रहे तो तीसरी बार यह दोनों उपचार करने चाहिए ।

मानसून की कुछ वर्षा होने के बाद सभी बेलों के थालों को 0.125% रिडोमिल मैन्कोज़ेब 5-10 लीटर प्रति बेल की दर से उपचारित करना चाहिए । पत्तों पर भी 0.125% रिडोमिल मैन्कोज़ेब का छिड़काव करना चाहिए ।

मई-जून में मानसून के आरम्भ होते ही बेलों के थालों में ट्राइकोडेर्मा 50 ग्राम प्रति बेल की दर से मिट्टी में मिलाना चाहिए । 0.3% पोटाशियम फोसफोनेट या 1% बोर्डो मिश्रण का छिड़काव करना चाहिए । अगस्त-सितम्बर में ट्राइकोडेर्मा का दूसरी बार प्रयोग करना चाहइ तथा 0.3% पोटाशियम फोसफोनेट या 1% बोर्डो मिश्रण का छिड़काव भी दोबारा करना चाहिए ।

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पोल्लू रोग या एन्थ्रेकनोज़ (Anthracnose)

यह रोक कोलट्टोट्राइकम ग्लोइयोस्पोरोइड्स नामक फफूँद के कारण होता है । इस रोग से प्रभावित बेरियों में विशेष प्रकार की दरारें दिखाई पड़ती हैं जिसके कारण ये बेरियाँ भृंग से होने वाले ‘पोल्लु’ (खोखली बेरी) से अलग दिखती हैं । मानसून की समाप्ति के साथ इसका संक्रमण होता है । रोग संक्रमण की आरम्भिक अवस्था में बेरियों में भूरे रंग के धंसे हुए धब्बे नज़र आते हैं और इससे बेरियों का विकास प्रभावित होता है । रोग संक्रमण अधिक होने पर बेरियों का रंग फीका हो जाता है । अंत में बेरियाँ काली होकर सूख जाती है । ये फफूँद पत्तो में अनियमित आकार  के भूरे धब्बे बनाती है । 1% बोर्डो मिश्रण के छिड़काव से इस रोग पर काबू पाया जा सकता है ।

स्टन्ट रोग (Stunt disease)

विषाणु से होने वाला यह रोग केरल के कोषिक्कोड़, वयनाडु एवं इडुक्की जिलों में पाया जाता है । बेलों की की अर्न्तगांठे (internode) छोटी हो जाती हैं । पत्तियाँ छोटी व संकुचित होकर चमड़े की तरह ऐंठन लिए हुए झुर्रीदार दिखती हैं । कभी कभी पत्तियों में क्लोरोटिक धब्बे एवं रेखाएं दिखाई पड़ते हैं । धीरे-धीरे रोग से प्रभावित बेलों की उपज कम हो जाती है । रोग के और फैलाव को रोकने के लिए प्रभावित बेलों की उपज कम हो जाती है । रोग के और फैलाव को रोकने के लिए प्रभावित बेलों को उखाड़ कर नष्ट करना चाहिए । ऐसी रोग संक्रमित बेलों से रोपण सामग्री का प्रयोग नहीं करना चाहिए ।

फाइलोडी रोग (Phyllody disease)

फाइटोप्लास्मा से होने वाला यह रोग केरल के वयनाडू और कोषिक्कोड जिले में पाया जाता है । रोग संक्रमित पौधों के फूलों गुच्छों में विभिन्न अवस्थाओं की विकृति पाई जाती है । कुछ फूलों की कलियाँ सिकुड़ी हुई पत्तियों जैसा रूप ले लेती हैं । ऐसे विकृत फूलों के गुच्छों में कलियों की जगह पत्तियाँ जैसी बन जाती हैं और यही फाइलोडी रोग का मुख्य लक्षण है । रोग का अत्याधिक प्रकोप होने पर पत्ते छोटे व क्लोरोटिक (Chlorotic) हो जाते हैं । फल लगने की शाखाएं रोग ग्रस्त होने पर झाडू जैसा रूप ले लेती हैं । अत्याधिक संक्रमित बेलों में पादप परजीवी सूत्र कृमियों (nematodes) के आक्रमण से जड़ों का विगलन हो जाता है । अक्तूबर में मिट्टी में नमी कम होने के साथ रोग ग्रस्त बेलों के पत्ते पीले हो जाते हैं । मई-जून में दक्षिणी-पश्चिमी मानसून की वर्षा आरम्भ होते ही कुछ रोग ग्रस्त बेलों की बढ़वार एवं उत्पादन क्षमता कम होती जाती है । इन बेलों में पोषक जड़ों (feeder roots) की क्षति हो जाती है और ऊपरी भागों में इसके लक्षण पोषक जड़ों को काफी मात्रा में क्षति हो जाने के बाद ही दिखाई पड़ते हैं । रोग ग्रस्त बेलों की जड़ों में पादम परजीवी सूत्रकृमि जैसे रेडोफोलस सिमिलस और मेलोडोगाइन इनकोगनिटा के आक्रमण की वजह से चित्ती तथा गांठें पड़ जाती हैं जिसके कारण पोषक जड़े सड़ जाती हैं । ये सूत्र कृमि तथा फाइटोफथोरा कैपसीसी नामक फफूंद अलग-अलग या मिलकर पोषक जड़ों को नुक्सान पहुंचाते हैं । अतः इस रोग के प्रबन्धन के लिए फफूँदनाशक एवं सूत्र कृमिनाशक दोनों को प्रयोग करना आवश्यक हो जाता है ।

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बुरी तरह से प्रभावित व रोग मुक्त न हो सकने वाली बेलों को बागों से उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए ।

रोपाई के समय गड्डों को फोरेट 10 G की मात्रा 15 ग्राम या कार्बोफ्युरान 3 G की मात्रा 50 ग्राम प्रति गड्डे की दर से उपचारित करना चाहिए ।

खेतों में रोपाई के लिए धूम्रित (fumigated) या सौरीकृत (solarized) रोपण मिश्रण में उगाई गई सूत्र कृमि रहित पौध सामग्री का प्रयाग करना चाहिए ।

मई-जून में दक्षिण-पश्चिमी मानसून के आरम्भ से और सितम्बर-अक्तूबर में फोरेट 10 G 30 ग्राम या 3 G कार्बोफ्युरान 100 ग्राम प्रति बेल की दर से प्रयोग करना चाहिए । फोरेट के साथ बेल के थाले (basin) की मिट्टी को 0.2% कोपर ओक्सीक्लोराइड या 0.3% पोट्टाशियम फोसफोनेट या 0.12% मेटालाक्सिल से उपचारित करना चाहिए ।

जड़-तंत्र को नुकसान किए बिना बेल के थाला की मिट्टी को पलटना चाहिए और सूत्रकृमिनाशक को थाला में एक समान रूप से फैलाना चाहिए तथा जल्दी से मिट्टी से ढकना चाहिए । सूत्रकृमिशानक के प्रयोग करते समय मिट्टी में काफी नमी होनी चाहिए । रोग की आरम्भिक अवस्था से ही नियन्त्रण उपायों को अपनाना चाहिए ।

काली मिर्च  की फसल में लगने वाले हानिकारक कीट

पोल्लु भृंग (Pollu beetle)

पोल्लु भृंग (लोंजिटारसस नाइगिपेन्निस) काली मिर्च को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाने वाला कीट है और यह मुख्यतः मैदानी क्षेत्रों में तथा 300 मीटर से कम ऊँचाई वाले इलाकों में देखा जाता है । इसका व्यस्क 2.5 मि.मी. x 1.5 मि.मी. के आकार का छोटा काला हानिकारक कीट होता है जिसका सिर एवं छाती का हिस्सा पीले भूरे रंग का तथा अग्र-पंख काले रंग के होते हैं । पूर्ण-विकसित सूंडियाँ 5 मि.मी. लम्बी तथा हल्के पीले रंग की होती हैं ।

व्यस्क भृंग कोप्पलों तथा गुच्छों को खाकर नष्ट करते हैं । मादा भृंग कोमल गुच्छों एवं पत्तियों पर अण्डे देती है । इसकी सूँडियाँ आंतरिक उत्तकों में प्रवेश करके उन्हें खाती है तथा प्रभावित गुच्छे काले होकर सड़ जाते हैं । रोग संक्रमण से दाने भी काले हो जाते हैं और दबाने पर टूट जाते हैं । मलायलम में ‘पोल्लु’ शब्द का अर्थ हो खोखला । बागों के छायादार स्थानों में कीट का अधिक प्रकोप होता है । सितम्बर-अक्तूबर में कीटों की संख्या अधिक होती है ।

बागों में बेलों पर छाया कम करने से कीटों का प्रकोप कम कर सकते हैं । जून/जुलाई तथा सितम्बर/अक्तूबर में क्विनालफोस (0.05%) अथवा जुलाई में क्विनालफोस (0.05%) और अगस्त, सितम्बर तथा अक्तूबर में नीमगोल्ड (0.06%) (नीम आधारित कीटनाशक) का छिड़काव इन कीटों के नियन्त्रण के लिए अधिक प्रभावी है । पत्तों की निचली सतह और गुच्छों पर अच्छी तरह छिड़काव करना चाहिए जहाँ व्यस्क कीट प्रायः देखा जाता है ।

ऊपरी शाखा छेदक (Top shoot borer)

ऊपरी शाखा छेदक (सिडिया हेमीडोक्सा) काली मिर्च उत्पादक सभी क्षेत्रों में कम आयु के पौधों को प्रभावित करने वाला कीट है । इसके व्यस्क छोटे पतंगे हैं, जिनके पंख 10-15 मि.मी. आकार के और अग्र पंख पीले रंग के तथा पीछे के भूर रंग वाले होते हैं । इनके लारवा कोमल उपरी टहनियों में घुस कर आंतरिक कोशिकाओं को खा लेते हैं, परिणामस्वरूप रोग संक्रमित टहनियाँ काली होकर सड़ जाती हैं । पूर्ण-विकसित लारवा स्लेटी-हरे रंग के तथा 12-15 मि.मी. लम्बे होते हैं । जब नई शाखाओं पर आक्रमण होता है तब पूरी बेल की बढ़वार पर इसका असर पड़ता है । जुलाई-अक्तूबर में जब बेलों में बड़ी संख्या में रसीली (Succulent) शाखाएं होती है, तब इस कीट का आक्रमण अधिक होता है । ऊपरी कोमल शाखाओं पर मोनोक्रोटोफोस पर छिड़काव करना चाहिए और नई अंकुरित होने वाली शाखाओं को बचाने के लिए जुलाई-अक्तूबर में दोबारा इन कीटनाशकों का छिड़काव करना चाहिए ।

पत्तियों का गाल थ्रिप्स (Leaf gall thrips)

ऊँचाई वाले क्षेत्रों में पत्तियों के गाल थ्रिप्स (लयोथ्रिप्स कार्नी) का संक्रमण खासकर कम उम्र की बेलों में और मैदानी क्षत्रों की पौधशालाओं में बहुत अधिक होता है । इसके वयस्क काले और 2.5-3.0 मि.मी. लम्बे होते हैं । लारवा और प्यूपा हल्के सफेद रंग के होते हैं । इन थ्रिप्स के द्वारा पत्ते खा लेने के कारण पत्तों के किनारे, नीचे की तरफ मुड़ जाते हैं और पत्ते के किनारे पर गाँठे या गिल्टी (gall) बन जाती है । बाद में कीट ग्रस्त झुर्रियां पड़कर विकृत हो जाते हैं । अत्याधिक प्रकोप होने पर कम आयु की बेलों और पौधशालाओं में जड़ कलमों की वृद्धि पर विपरित प्रभाव पड़ता है । बेलों और पौधशालाओं में अंकुरण आने पर मोनोक्रोटोफोस या डाइनोथोएट (0.05%) का छिड़काव करना चाहिए ।

शल्क या स्केल कीट (Scale insect)

काली मिर्च को प्रभावित करने वाले विभिन्न प्रकार के स्केल कीटों में मसल स्केल (लेपिडोसाफस पाइपेरिस) और नारियल स्केल (अस्पिडोटस डिस्ट्रक्टर) अधिक ऊँचाई वाले स्थानों में और मैदानी क्षेत्रों में पौधशाला में बड़ी कलमों को प्रभावित करता है । मसल स्केलों की मादा लम्बी (1 मि.मी. लम्बी) तथा गहरे बादामी रंग वाली है और नारियल स्केल की मादा वृत्ताकार (लगभग 1 मि.मी. व्यास) तथा पीले-बादामी रंग वाली होती है । स्केल कीट स्थाई रूप से बेलों के विभिन्न भागों में स्थिर रहकर तने, पत्ते व दानों पर पचड़ी जैसे दिखाई पड़ते हैं । ये पौधे के रस चूस लेते हैं परिणामस्वरूप संक्रमित भाग पीले होकर मुरझा जाते हैं । बेलों के संक्रमित भाग सूख जाते हैं । मानसूनोत्तर एवं गर्म मौसम में इस कीट का आक्रमण तीव्र होता है ।

अधिक संक्रमित शाखाओं को काटकर नष्ट करना चाहिए । मोनोक्रोटोफोस या डाइमोथोएट (0.01% प्रत्येक) छिड़कना चाहिए और संक्रमण के पूर्णतः नियंत्रण के लिए 21 दिनों के बाद दोबारा छिड़काव करना चाहिए ।

अन्य कम हानिकारक कीट

पत्ते खाने वाली सूँडियाँ, खासकर सौनिजिया स्पी, तरुण बेलों के पत्तों व गुच्छों को नुकसान पहुँचाती है और क्विनालफोस0.05% छिड़कने से इसको नियंत्रित किया जा सकता है । मीली बग (mealy bug) गाल मिड्जस (gall midges) और एफिड्स (aphids) तरुण बेलों को खासकर पौधशालाओं में प्रभावित करते हैं । यदि अधिक प्रकोप है तो मोनोक्रोटोफोस (0.05%) छिड़कना चाहिए । जड़ों में मीली बग के आक्रमण को रोकने के लिए 0.075% क्लोरपाइरिफोस से उपचारित करना चाहिए ।

मई-जून में मानसून के आरम्भ के साथ बेलों के आधार में ट्राईकोडेर्मा 50 ग्राम प्रति बेल की दर से प्रयोग करना चाहिए । 0.3% पोट्टाशियम फोसफोनेट या 1% बोर्डो मिश्रण से पत्तों पर छिड़काव करना चाहिए । अगस्त-सितम्बर में ट्राईकोडेर्मा की दूसरी बार प्रयोग तथा 0.3% पोट्टाशियम फोसफोनेट या 1% बोर्डो मिश्रण का छिड़काव करना चाहिए ।

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तुड़ाई व प्रसंस्करण

केरल में मई-जून में काली मिर्च पर फूल आते हैं । फूल आने से तुड़ाई तक 6-8 महीने लगते हैं । मैदानों में नवम्बर से जनवरी तक और पहाड़ी इलाकों में जनवरी से मार्च तक तुड़ाई की जाती है । जब गुच्छे के एक या दो दाने चमकीले नारंगी रंग के हो जाते हैं तो गुच्छे को हाथ से तोड़ते हैं । दानों को गुच्छे से अलग करके 7-10 दिन तक धूप में सुखाते हैं । सूखी काली मिर्च में फफूँद के आक्रमण को रोकने के लिए इसमें 8-10% नमी रखनी चाहिए । दानों को हाथ से या मशीन से गुच्छों से अलग किया जा सकता है । 0.5 से 1.5 टन/घंटे की क्षमता वाली थ्रेषर (thresher) मशीन उपलब्ध है । इससे काली मिर्च के दाने तेजी से तथा सफाई से अलग किए जा सकते हैं । सूख जाने पर काली मिर्च को व्यापारिक काली मिर्च की विशेष झुर्रियों वाली शक्ल मिल जाती है । धूप में सुखाने के पहले ताजे दानों को एक मिनट तक गर्म पानी में डुबाने से दानों को आकर्षक काला रंग मिलता है तथा ये कम समय में सूख जाते हैं ।

सुखाने के लिए पीसी हुई मेथी का लेप लगाए हुए बाँस की चट्टाई, सिमेंट का फर्श, उच्च घनता वाले काला पोलिथीन शीट आदि का इस्तेमाल किया जाता है जिससे सूखी काली मिर्च को बेहतर शक्ल व स्वच्छता मिलती है । सुखाने के लिए खोपरा ड्रायर, कनवेक्शन ड्रायर (convection drier) और कैस्केड रूपी ड्रायर (cascade drier) आदि यांन्त्रिक मशीनों का भी प्रयोग किया जा सकता है । याँत्रिक ड्रायरों से लगभग 60o सेल्सियस का तापमान रखना चाहिए ।

व्यापारिक सफेद मिर्च या तो काली मिर्च के ताजे दानों से या सूखी हुई काली मिर्च को गलाने (retting), वाष्पन (steaming), तथा इसके बाहरी आवरण को उतारने जैसी (decortications) विशेष तकीनीकों द्वारा तैयार की जाती है । पकी हुई काली मिर्च के दानों से लगभग 25% सफेद मिर्च मिलती है । इसके लिए सबसे प्रचलित तरीका ‘वाटर स्टीपिंग’ (water steeping) है, जिसमें 8-10 दिनों तक काली मिर्च के दानों को पानी में भिगो कर रखते हैं और फिर बाहरी आवरण को हटाकर पानी में धोकर धूप में सुखाते हैं । पन्नियूर-1 किस्म के दाने सफेद मिर्च तैयार करने के लिए सबसे अच्छे माने जाते हैं ।

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