फसलों में रोगों की रोकथाम हेतु बायोएजेन्ट (जैव अभिकर्ता)|

फसलों में रोगों की रोकथाम

फसलों में  रोगों,कीटों व खरतावारों से अत्यधिक क्षति होने के कारण वर्तमान में किसान अनियंत्रित ढंग से कृषि रासायनों का प्रयोग कर रहे है। कृषि रसायनों के अनियंत्रित प्रयोग के अप्रत्यक्ष दुष्परिणाम है, जैसे कीट व्याधियों का कृषि रासायनों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता, प्राकृतिक शत्रुओं का विनाश, मनुष्य व पशुओं में स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या, पर्यावरण प्रदूषण इत्यादि है। उपलब्ध भूमि पर उत्पादन बढ़ाने के लिए आवश्यकता होती है एक प्रभावशाली सुरक्षा प्रणाली की, जोकि निम्न लागत, टिकाऊ एवं पर्यावरण व मानव स्वास्थ के अनुकूल हो। पौधों में रोगों के नियन्त्रण हेतु जैव नियन्त्रण इस प्रकार की सुरक्षा प्रणाली का अंग है। जैव नियंत्रण वह प्रक्रिया है जिसमें किसी जीव द्वारा उत्पन्न की गयी परिस्थितियों एवं प्रक्रियाओं के कारण दूसरे जीव का आशिंक अथवा पूर्णरुप से विनाश किया जाता है। रोगजनकों का विनाश करने वाले जीव जैव अभिकर्ता कहलाते है। इस प्रकार रोगजनक द्वारा उत्पन्न की जाने वाली बीमारियों की सघानता में कमी आती है। जैव नियंत्रण निम्नलिखित तीन महत्वपूर्ण क्रियाओं द्वारा रोगजनक जीवों का विनाश करते है।

फसलों में रोगों की रोकथाम

फसलों में रोगों की रोकथाम[photo source-http://kisanhelp.in/]

1. प्रतिस्पर्धाः– यह वह क्रियो है जिसमें वातावरण में उपलब्ध कुछ साधनों जैसे स्थान, पोषक, पदार्थ, जल, हवा, इत्यादि के उपयोग के लिए एक जीव दूसरे जीव पर हानिकारक प्रभाव डालते है। जिससे
उनकी जनसंख्या नियंत्रण में रहती है।
2. प्रतिजैविकताः– इस प्रक्रिया में जैव विभिन्न प्रकार के प्रतिजैविक पदार्थ उत्पन्न करते हैं जो रोगकारकों के लिए विष की तरह काम करते है अर्थात इन विषैले पदार्थो के करण रोगकरकों की संख्या नष्ट हो जाती है। प्रतिजैविकता मुख्यतः दो प्रकार के वाष्पशील व अवाष्पशील गौड़ उत्पादों के कारण होती है जैव नियंत्रकों से अब तक विभिन्न प्रकार के जैविक पदार्थ अलग किये जा चुके हे जैसे ट्राइकोर्डमा प्रजाति से ट्राईकोडमिन, ग्लायोक्लेडियम से ग्लयोटाक्सिन, स्यूडोमोनास से फेनाजिन, थायोल्यूटोरिन, टोपोलिन आदि।
3. कवक परजीविताः– इसमें जैव नियंत्रक रोगकारक जीव के शरीर से चिपककर उसकी बाहरी परत को कुछ प्रतिजैविक पदार्थो द्वारा गलाकर उसके अन्दर का सारा पदार्थ उपयोग कर लेता है जिससे रोगकारक जीव नष्ट हो जाता है। यह प्रक्रिया को प्रदर्षित करते है।
पिछले दो दशकों में बहुत से जैव अभिकर्ता व्यावसायिक स्तर पर बाजार में उपलब्ध है। जिसमें रोग नियंत्रण के लिए ट्राईकोडर्मा एवं स्यूडोमोनास नामक जैव अभिकर्ता अधिक प्रचलित है।

भारत में प्रयोग होने वाले खेती के नाप

इन जैव अभिकर्ता का प्रयोग कई तरीकों से किया जाता है जैसे: ।

1. बीज उपचारः– बीजों के लिए 8-10 ग्राम/किलो बीज की दर से बीजों को उपचारित किया जाता है। यदि बीज पहले से रासायनिक दवाओं द्वारा उपचारित हो तो उन्हें पानी से धोकर तब जैव अभिकर्ता द्वारा उपचारित करना चाहिए। बीजोपचार के लिए बीजों के ऊपर थोड़ा सा पानी छिड़कर संस्तुत दर के आधार पर जैव अभिकर्ता पाउडर ठीक से मिला देते है। इसके बाद बीज को थोड़ी देर छाया में रख देते है जिससे जैव अभिकर्ता की पर्त बीज के ऊपर लग जाए। तत्पश्चात बीज की बुवाई कर देते है।
2. कन्दः- प्रकन्द उपचारः- अदकर, अरबी, आलू आदि के उपचार के लिए 8-10 ग्राम जैव अभिकर्ता प्रति लीटर पानी में घोलकर उसमें कन्दों को डुबोकर निकाल देते है और उन्हें छाया में सुखाने के बाद बुवाई कर देते है।
3. पौध उपचारः- रोपाई के पहले पौध को पौधशाला में उखाड़कर पौध की जड़ को जैव नियंत्रक के घोल से उप्चारित करते है। जड़ को पानी से अच्छी तरह साफ करने के बाद 8-10 ग्राम/लीटर जैव अभिकर्ता का पानी में घोल बनाकर उसमें आघा घंटे तक जड़ डुबा के पौधों की रोपाई करते है। पौध उपचार मुख्यतः सब्जियों जैसे: गोभी, मिर्च, बैंगन, टमाटर आदि के पौधों की करते है।
4. खाद उपचारः- सड़ी हुई गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट को खेत में डालने से पहले जैव अभिकर्ता द्वारा उपचारित किया जाता है। इसके लिए 250 ग्राम जैव अभिकर्ता को एक कुन्तल सड़ी हुई गोबर की खाद या केचुओं द्वारा तैयार की गयी वर्मीकम्पोस्ट में भली-भाॅती मिलाकर प्रयोग करना चाहिए। खाद बनाते समय गड्ढों में भी जैव अभिकर्ता को नियमित रुप से मिलाया जा सकता है। जिससे कम्पोस्ट की उर्वरा शक्ति में वृद्वि होती है तथा जैव अभिकर्ता को कार्बनिक पदार्थ मिल जाने के कारण उसमें तेजी से पनपता है। इस प्रकार कम लागत में अधिक जैव अभिकर्ता तैयार कर अधिक क्षेत्रफल में फैलाया जा सकता है।
5. छिड़कावः- बीज एवं मृदा जनित रोगों के रोकथाम के अतिरिक्त जैव अभिकर्ता द्वारा हवा द्वारा फैलाई जाने वाली बिमारियों को भी रोका जा सकता है। इसके लिए 8-10 ग्राम/लीटर जैव अभिकर्ता पानी में मिलाकर घोल का छिड़काव समय≤ पर फसल में किया जाना चाहिए।
6. सिंचाईः- जैव अभिकर्ता का 8-10 ग्राम/लीटर घोल बनाकर सब्जियों की पौधाशाला की समय-समय पर सिंचाई करनी चाहिए जिससे पौधे स्वस्थ रहेंगे एवं उसकी बढ़वार अच्छी रहेगी।
जैव अभिकर्ता के लाभः-
खेती में परिस्थितिकी तन्त्र के अनुकूल रोग नियंत्रण प्रणाली को अपनाया जाना आवश्यक है। वह प्रणाली ऐसी हो जो मिट्टी में रहने वाले सुक्ष्मजीवों की विविधता एवं जनसंख्या को प्रोत्साहित करें ताकि सूक्ष्मजीव फसलों के लिए लाभदायक तथा रोगजनकों के लिए हानिकारक हो। जैव अभिकर्ता द्वारा रोगों का नियंत्रण एक उपयुक्त विकल्प है जोकि जैविक कृषि के अनुरुप भी है। क्य़ोकिं यह पूर्णरुप से जैविक प्रक्रिया है इसलिए जैव नियंत्रण से फसलों की सुरक्षा के साथ-साथ मिट्टी की गुणवत्ता को प्रदूषित होने से भी बचाया जा सकता है।
प्रयोग में सावधानियाॅः-
1. जैव अभिकर्ता को प्रयोग करने से पहले उसकी उत्पादन तिथि को अवश्य देख ले।
2. अधिकांश रोग उपचार हेतु प्रयोग किये जाने वाले कृषि रसायनों के साथ जैव अभिकर्ता का प्रयोग नहीं किया जा सकता ।
3. जैव अभिकर्ता को कमरे के तापमान पर मात्र 4-6 माह तक भण्डारित किया या सकता है।
4. जैव अभिकर्ता को छायादार स्थान पर भण्डारित करना चाहिए।
5. मिटटी में नमी तथा उचित कार्बनिक पदार्थ जैव अभिकर्ता की क्रियाशीलता को बढ़ता है।
6. जैव अभिकर्ता, सूक्ष्मजीव के जीवित बिजाणु है अतः प्रयोग करते समय यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि प्रयोग के लिए संदर्भित उत्पाद में जैव अभिकर्ता के संस्तुत जीवित बिजाणु है।

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