जानिये कैसे होती है धान के खेत की स्थापना एवं प्रमुख रोग नियत्रंण प्रबंधन

विश्व में धान (चावल) के कुल उत्पादन का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा कम आय वाले देशों में छोटे स्तर के किसानों द्वारा उगाया जाता है। इसलिए विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक विकास और जीवन में सुधार के लिए दक्ष और उत्पादक धान (चावल) आधारित पद्धति आवश्यक है |

धान की खेती चीन, भारत और इंडोनेशिया में शुरू हुई, जिससे धान (चावल) की तीन किस्में पैदा हुई – जेपोनिका, इंडिका और जावानिका

धान

धान की नर्सरी डालने एवं रोपाई का उचित समय

क्षेत्र नर्सरी नर्सरी डालने का समय पौध की रोपाई का समय
मैदानी क्षेत्र, घाटियॉ एवंकम ऊँचे क्षेत्र ( 900 मीटरकी ऊचाई तक ) मई प्रथम पखवाड़ाजून का द्वितीय पखवाड़ा जून अंत से जुलाईका,प्रथम सप्ताह
मध्यम ऊँचे क्षेत्र ( 900 मीटरसे 1500 मीटर ऊँचाई तक ) मई प्रथम पखवाड़ा जून का द्वितीय पखवाड़ा
ऊँचे क्षेत्र ( 1500 मीटर से ऊपर ) अप्रैल का द्वितीय पखवाड़ा जून का प्रथम पखवाड़ा


मैदानी क्षेत्र में धान की विभिन्न प्रजातियों की नर्सरी डालने एवं रोपाई का उपयुक्त समय

प्रजातियाँ नर्सरी डालने का समय रोपाई का उपयुक्त समय
बासमती 15 जून से 30 जून तक जुलाई अंत तक
जल्दी पकने वाली प्रजातियाँ 10 जून से 20 जून तक 25 जून से जुलाई अंत तक
मध्यम अवधि मेंपकनेवाली प्रजातियाँ 25 मई से 10 जून तक 15 जून से 15 जुलाई तक


बीज दर एवं बुवाई


पर्वतीय क्षेत्र में सीधी बुवाई                                       –  100 किलोग्राम/है0

(चेतकी एवं जेठी धान) हेतु बीज दर                                (2.0 किलोग्राम/नाली)
पंक्ति से पंक्ति की दूरी                                            –  20 से.मी.

बीज की बुवाई                                                      –  4-5 से.मी. की गहराई पर

धान की नर्सरी हेतु बीज दर

सुगधत/पतला/महीन धान                                          – 30 किलोग्राम/है
(600 ग्राम प्रति नाली)

मध्यम मोटा धान                                                    –  30-35 किलोग्राम/है
(600-700 किलोग र म प्रति नाली)

मोटा धान                                                            – 35-40 कि.ग्राम/है0
(700-800 किलोगर म प्रति नाली)

संकर धान                                                           – 20 कि.ग्राम/है0
(400 किलोग्राम प्रति नाली)

बीज शोधन :- स्वंय उत्पादित बीज का शोधन अवश्य करे ।

धान बीज शोधन की विधि

स्वस्थ बीज प्राप्त करने हेतु 10 लीटर पानी में 1.5 किलोग्राम साधारण नमक डालकर घोल बनाएॅ। इस घोल में स्वंय उत्पादित बीज को डालें एवं लकड़ी के डंड  से चलाए। तैरते कमजोर बीज को निकालकर नष्ट कर दे । तलहटी में बैठे बीज को 5-6 बार साफ पानी से घो ए  । बीज में नमक की मात्रा लगी न रहे इस बात विशेष ध्यान दे । अब 25 किलोग्राम बीज के लिए 4 ग्राम स्टं प् टोसाइक्लीन को 25-30 लीटर पानी में घोलकर बीज को रात भर भिगो ए  । दूसरे दिन बीज को पानी से निकाल ले । अब 75 ग्राम थीरम अथवा 50 ग्राम कार्बन्डाजिम को 5-6 लीटर पानी में घोलकर बीज में मिलाए। इसके बाद छायादार स्थान में बीज को अंकुरित करने हेतु रखे । अंकुरित बीजों की धान की नर्सरी में बुवाई करे ।

धान नर्सरी हेतु स्थान का चयन

धान की पौधशाला/नर्सरी हेतु दोमट, उपजाऊ सिंचित भूमि जहाँ जल निकास की व्यवस्था हो, का चुनाव करे । धान की प्रजातियों में मिलावट न हो इसके लिए उन खेतों का चुनाव करें जिसमें पिछले वर्ष धान की खेती नहीं की गई हो तथा वहाँ धान की गहाई/मड़ाई नहीं किया गया हो। सिंचित क्षेत्रों में धान की नर्सरी गीली विधि द्वारा तैयार करना चाहिए।

सामान्यतः मुख्य खेत के 10 प्रतिशत क्षेत्रफल में धान की पौधशाला तैयार करते है । यानी एक हैक्टर रोपाई हेतु 1000 वर्गमीटर की पौधशाला/नर्सरी क्षेत्र रखते है ।

धान नर्सरी हेतु खेत की तैयारी एवं पौधशाला प्रबंधन

खेत की सूखी अवस्था में दो-तीन बार जुताई करे ।  इसके बादखेत में 2 से 3 से.मी. पानी भर कर 5-6 दिनों के अंतराल पर 3 से 4 बार जुताई करे ।  खेत को समतल कर 10 वर्ग मीटर ( 8 वर्गमीटर लम्बी तथा 25 मीटर चौड़ी ) की क्यारियाँ बना ले । प्रत्येक क्यारी के चारों ओर 30 से. मी. चौड़ी मेड़ बना ले । क्यारियों को खेत से 5-7 से.मी. ऊँचा रखे ।  10 वर्ग मीटर नर्सरी में सूखी जुताई के समय 50-60 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद तथा अंतिम गीली जुताई के समय 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 80 किलोग्राम फास्फोरस एवं 40 किलोग्राम पोटाश/हे. की दर से डाले ।  प्रत्येक 10 वर्गमीटर पौधशाला में 0.4-0.5 किलोग्राम धान के अंकुरित बीजों को बोएॅ। शुरु में 5-6 दिनों तक बीजों को चिड़ियों से बचाव हेतु रखवाली करना चाहिए। शुरु के कुछ दिनो तक पौधशाला को केवल नम रखना चाहिए। जब अंकुर 1-2 से.मी. लम्बे हो जाय तब 1 2 से.मी. पानी भरे ।  पौधशाला में सिंचाई शाम को करे ।

खरपतवार नियंत्रण हेतु बुवाई के 10 दिन बाद निराई करे । जहॉ मानव श्रम की कमी हो वहॉ रासायनिक खरपतवार नियंत्रण हेतु बीज बुवाई के 4-5 दिन बाद जब पौध दो-तीन पत्ती दिखायी दे तब ब्यूटाक्लोर या बेन्थियोकार्व 1.25-1.50 कि.ग्राम/है. की दर से छिड़काव करे । पौधशाला में आवश्यक्तानुसार सुरक्षात्मक छिड़काव करे ।

धान की रोपाई

समान्यतः जब धान की पौध में 4 पंत्तियॉ हो जाय तब रोपाई करनी चाहिए। 5 पत्तियों से अधिक उर्म की पौध की रोपाई नहीं करनी चाहिए।जब पौध स्वस्थ हो तो तीन पत्ती की अवस्था में भी रोपाई कर सकते है तथा पौध उखाड़ते समय विशेष सावधानी रखें ताकि पौध की जड़ न टूट। शीध्र एवं मध्यम अवधि के बौने धान की प्रजातियों की पौध की रोपाई एक स्थान पर 2-3 पौध लगाये। रोपाई 2-3 से.मी. गहराई से ज्यादा नहीं करनी चाहिए। अगर रोपाई में विलम्ब हो रहा हो तथा 40-45 दिन से अधिक की पौध की रोपाई करनी हो तो पौध की 30 दिन की अवस्था में 30 किलोग्राम नाइट्रोजन/हैक्टर की दर से टाप ड्रेसिंग करे । 40-45 दिन से अधिक उर्म की पौध का प्रयोग करते समय प्रत्येक स्थान पर 4-5 पौध लगाए।

पंक्ति से पंक्ति की दूरी 20 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 से. मी. या पंक्ति से पंक्ति से पंक्ति की दूरी 15 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 15 से.मी. रखनी चाहिए। अगर पंक्तियों में रोपा जाना संम्भव न हो तो यह ध्यान अवश्य रखना चाहिऐ कि पौधों को प्रति वर्गमीटर में 40-50 स्थानों पर रोप । अच्छे प्रब धान की दशा में रोपाई 20 से.मी. × 20 से.मी. पर की जा सकती है। मैदानी एवं घाटी क्षेत्रों हेतु 21-25 दिन, मध्य क्षेत्रों के लिये 30-35 दिन एवं अधिक ऊचे क्षेत्रों हेतु 45-50 दिन की पौध उपयुक्त होती है। रोपाई के एक सप्ताह बाद जहॉ-जहॉ पौध मर गये हो वहॉ नए पौध को लगा देना चाहिए जिससे प्रति ईकाई पौधों की संख्या कम न हो।

धान की खेती में कौन से जैव उर्वरक का प्रयोग उपयोगी है

उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करना लाभदायक होता है। अगर मृदा परीक्षण नहीं कराया गया है तब सामान्यतः उर्वरकों की निम्न मात्रा प्रयोग करना चाहिए।

असिचिंत उपराऊ ( मात्रा किलोग्राम में )

प्रजातियाँ नत्रजन फास्फोरस पोटाश
एक हैक्टर में 60 30 20
एक नाली में 1.2 0.6 0.4

नत्रजन उर्वरक का चौथाई भाग तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय प्रयोग करे । नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई के तीन से चार सप्ताह उपरान्त प्रथम कल्ले फूटते समय निराई करने के बाद तथा शेष एक चौथाई मात्रा को बोने के 70-75 दिन बाद बाली बनने की प्रारम्भिक अवस्था के समय टापडं िसंग के रुप में प्रयोग करे ।  यदि कम्पोस्ट या सड़ी गोबर की खाद उपलब्ध हो तो 10-15 टन प्रति हे. की दर से बोने के 15-20 दिन पहले खेत में मिला देना चाहिए एवं नत्रजन उर्वरक की आधी मात्रा प्रयोग करनी चाहिये।

पर्वतीय क्षेत्र ( मात्रा किलोग्राम में )
प्रजातियाँ नत्रजन फास्फोरस पोटाश
बौनी किस्में
एक हैक्टर में
एक नाली में
100-120
2.0-2.4
60
1.2
40
0.8
देशी किस्में
एक हैक्टर में
एक नाली में
60
1.2
30
0.6
30
0.6

पर्वतीय घाटियों, तराई-भावर एवं मैदानी क्षेत्र ( मात्रा किलोग्राम में )
प्रजातियाँ नत्रजन फास्फोरस पोटाश
उन्नतशील प्रजातिया 120 60 40
धान-गेहूँ फसल चक्र 150 60 60
संकर किस्में 150 60 60
संकर किस्में 100 60 40
देशी/सुगंधित 60 30 30

 

प्रयोग विधि :-
नत्रजन उर्वरक की आधी तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई से पहले अंतिम जुताई के समय प्रयोग करना चाहिए। नत्रजन की बची मात्रा का आधा भाग कल्ले फूटते समय (रोपाई के 20-25 दिन पर) तथा आधा भाग बाली बनने की प्रारम्भिक अवस्था में ( रोपाई के 40-50 दिन पर ) टॉपड्रेसिंग द्वारा प्रयोग करना चाहिए।

धान के अधिकतम उत्पादन हेतु कम्पोस्ट या सड़ी गोबर की खाद को खेत की तैयारी से 15-20 दिन पहले खेत में मिला देना चाहिए। मैदानी क्षेत्र में रबी की फसल की कटाई के बाद मई माह में ढ़ैचा अथवा सनई की बुवाई हरी खाद हेतु करना चाहिए तथा 45-60 दिन बाद रोपाई से पूर्व इसेखेत में मिला देना चाहिएं। इससे नत्रजन की आधी मात्रा की बचत होती है। जिन क्षेत्रों में खेत में प्रायः पानी भरा रहता है वहॉ अजोला एवं जैव उर्वरक नीली हरी शैवाल का प्रयोग करना चाहिए। इससे नत्रजन उर्वरकों की बचत की जा सकती है।

खरपतवार प्रबंधन

असिचिंत ( उपराऊ ) क्षेत्र में कम से कम दो बार खुरपी/कुटला द्वारा निराई करे। धान के जमाव के बाद 20-25 दिनों के अन्दर ही पहली निराई करना आवश्यक है। इसके बाद आवश्यकतानुसार निराई करे । सिंचित क्षेत्रों में रोपाई वाले धान में समय से निराई, रोपाई से 20-25 तथा 40-50 दिन पर अवश्य करे ।  मानव श्रम की कमी हो तो खरपतवार प्रबंधन हेतु खरपतवार नाशियों का प्रयोग कर सकते है। घास कुल एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार नियंत्रण हेतु ब्यूटाक्लोर 50 ई.सी. को 1.5 किलोग्राम सक्रिय तत्व/हैक्टर अथवा प्रैटिलाक्लोर 50 ई.सी. 750 ग्राम सक्रिय तत्व/हैक्टर का छिड़काव रोपाई के 2-3 दिन के अंदर करे । अगर इस अवधि में छिड़काव नहीं किया गया हो तो उस अवस्था में पिनाक्सुलम की 22.5 ग्राम/हैक्टर रोपाई के 5-10 दिन के अंदर अथवा बिस्पाइरीबैक सोडियम 10 ई.सी. के 20-25 ग्राम सक्रिय तत्व/हैक्टर का छिड़काव रोपाई के 20-25 दिन बाद खड़ी फसल में करे ।

यदि चौड़ी पत्ती एवं मोथा वर्गीय खरपतवारों की बहुलता हो तो मेटसल्फ्यूरान मिथाइल 50 डब्लू.पी. के 4 ग्राम सक्रिय तत्व/हैक्टर अथवा 2, 4-डी. के 500 ग्राम सक्रिय तत्व/हैक्टर का छिड़काव रोपाई के 25-30 दिन बाद करे । यदि खेत में अमेरिकन घास ( लेप्टोक्लोवा चाइनेसिस ) की बहुलता हो तो पायरोजोसल्फ्यूरान की 250 ग्राम सक्रिय तत्व/हैक्टर की रोपाई के 3-4 दिन बाद अथवा साईहैलोफाप ब्यूटाइल की 80-100 ग्राम सक्रिय तत्व/हैक्टर को रोपाई के 20-25 दिन बाद खड़ी फसल में छिड़काव करे ।  छिड़काव हेतु 400-500 लीटर पानी का प्रयोग करे ।

सिंचाई प्रबंधन

धान की फसल को खाधान्य फसलों में सबसे अधिक पानी की आवश्यकता होती है। फसल की कुछ विशेष अवस्थाओ , रोपाई के बाद एक सप्ताह तक, कल्ले फूटने, बाली निकलने, फूल खिलने तथा दाना भरते समय खेत में पानी बना रहना चाहिए, फूल खिलने की अवस्था पानी के लिए अति संव द नशील है ।  धान की अधिक उपज लेने के लिए लगातार पानी भरा रहना आवश्यक नहीं है। इसके लिए खेत की सतह से पानी अदृश्य होने के एक दिन बाद 5-7 सेमी. सिंचाई करना उपयुक्त होता है। यदि वर्षा अभाव के कारण पानी की कमी दिखाई दे तो सिंचाई अवश्य करे । कल्ले निकलते समय पानी अधिक न रखें क्यो ि  क कल्ले प्रभावति होते है। अतः जिन क्षेत्रों में पानी भरा रहता है वहॉ जल निकासी का प्रबन्ध करना चाहिए।

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