फरवरी माह में मैदानी क्षेत्र एवं पर्वतीय क्षेत्र में होने वाली फसले, फल, पुष्प, पशुपालन।

फरवरी माह में  मैदानी क्षेत्र में होने वाली फसले

गेहूँ समय से बोई गई गेहूँ की फसल अब पुष्पावस्था में आ रही है। इस समय चौथी सिंचाई अवश्य करें । दिसम्बर के द्वितीय पखवाड़े में बोई गई फसल में चौैडी़ पत्ती वाले खरपतवारों की रोकथाम के लिए बुवाई के 40-45 दिन बाद 2,4-डी. 80 प्रतिशत शुद्धता वाली दवाई की 625 ग्राम मात्रा प्रति हैक्टर को 800 लीटर पानी में घोलकर छिड़कें आजकल गेहूँ में करनाल बन्ट रोग का प्रकोप बढ़ रहा है। अतः स्वस्थ एवं निरोगी बीज पैदा करने हेतु बाली आते ही 2 किलोग्राम मैकोजेव या 500 मिली. प्रोपीकानाजाल को 800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करें। अल्टरनेरिया, झुलसा एवं गेरूई रोग के लिये भी उपरोक्त दवा का छिड़काव करें। अगर माहू का प्रकोप हो तथा माहू को खाने वाले गिडार की संख्या कम हो तो क्वीनालफास 25 ई.सी. का 1.00 लीटर या मोनोक्रोटोफास 25 ई.सी. का 1.4 लीटर दवा को मिथाइल- ओ-डिमेटान 25 ई.सी. का 1.0 लीटर दवा 800-1000 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें।

राई:-राई की फसल में सफेद गेरूई रोग का प्रकोप होने पर मैकोजेव 75 डब्लू.पी. जो कि बाजार में रीडोमिल एम जेड-72 का 2.5 किलोग्राम दवा को 800-1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर छिड़काव करना चाहिए। राई-सरसों की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए फूल आने व दाना भरने की अवस्थाओं पर अवश्य सिंचाई करें।

दलहनी फसलें चना में आवश्यकता हो तो फल आने से पूर्व ही सिंचाई करें। फूल आते समय सिंचाई नहीं करना चाहिए अन्यथा फूल झड़ने से हानि होती है। चना, मटर एवं मसूर में फलीछेदक, कीट की सूड़ियों के नियंत्रण हेतु उन्हें हाथ से पकड़कर नष्ट कर देना चाहिए। चिड़ियों द्वारा इस कीट के नियंत्रण हेतु चिड़ियों के बैठने के लिए 4-5 फीट के बांस के टुकड़ों पर लकड़ियां बांध कर खेत में कई स्थानों में गाड़ना चाहिए। चने में फलीछेदक एवं सेमीलूपर की संख्या बढ़ने लगे तो इसके नियंत्रण हेतु जैसे ही फली बनना शुरू हो तो मोनोक्रोटोफास 36 ई.सी. 750 मिली/ली. दवा का छिड़काव 800 से 1000 ली. पानी में घोल कर करें।

गन्ना : गन्ने की बुवाई का उपयुक्त समय फरवरी माह का मध्य है। बुवाई हेतु उन्नतशील नवीनतम प्रजतियों का चुनाव करें । बीज प्रमाणित पौधशाला से प्राप्त करना चाहिए या निरोगी नौलख फसल से बीज लें । गन्ने की शीघ्र पकने वाली किस्मों को.जे. 64, को.जे. 85, को.शा. 8436, को.शा. 88230,को.शा. 96268, को.शा. 98247,को.पन्त. 3220, को. 0238, को. 0239, को. 0118, को. 98014,को.शा. 95436, को.शा. 98247 आदि में से उपलब्धतानुसार किस्मों का प्रयोग करें । मध्य या देर से पकने वाली किस्मों को.शा. 8432, को. शा.94257,को.शा.96275,को.शा. पंत 84212, को.शा 90223, को.पन्त 96219, को.पन्त 97277, को.पन्त 99214, को.शा. 96275, यू.पी. 0097 आदि में से उपयुक्त किस्म का चुनाव करें । जल मग्न क्षेत्र के लिए को.शा 96436, यू.पी. 9529, यू. पी. 9530 आदि किस्मों का चुनाव करें । यदि संभव हो सके तो बीज के उपचार हेतु पारायुक्त फंफूदीनाशक रसायन का प्रयोग करें। बीज नसर्री हेतु बीज गन्ना को पहले नम-गर्म
हवा 1⁄4एम.एच.ए.टी.1⁄2 से उपचारित कराकर ही बुवाई करनी चाहिए। बुवाई 75 सेमी. दूरी पर बने कूडो़ में करनी चाहिए। लाईन में प्रति मीटर 3 आंखों वाले कम से कम तीन टुकड़ों का प्रयोग करना चाहिए। अच्छी उपज के लिए गन्ना के बसंतकालीन फसल में 120-150 किग्रा नत्रजन, 50-60 किग्रा फास्फोरस तथा 30-40 किग्रा पोटाश/है. की आवश्यकता होती है।

सूरजमुखी: सूरजमुखी की बुवाई का उपयुक्त समय फरवरी का दूसरा पखवाड़ा है। बुवाई हेतु सूरजमुखी की उन्नतशील संकर किस्मों पैरी 3848, पी.एस.एफ.एच.118, एन.एस.एफएच-30, एस.एफ.एच. 6163 आदि तथा किस्म मार्डन का चुनाव करें । बुवाई कतारों में 4-5 सेंटीमीटर गहराई पर करनी चाहिए। लाईन से लाईन की दूरी 45 सेमी. रखें और बुवाई के 15-20 दिन बाद सिंचाई से पूर्व थिनिंग 1⁄4विरली-करण1⁄2 द्वारा पौधे से पौधे की दूरी 15 से.मी. कर देनी चाहिए। एक हैक्टर क्षेत्र के लिए सामान्य किस्म की 7-8 किलोग्राम बीज दर तथा संकर प्रजाति का 5-6 किलोग्राम बीज उपयुक्त रहता है। अच्छे जमाव हेतु बीज को 12 घंटे पानी में भिगोकर साये में 3-4 घंटे सुखाकर बुवाई करें । बीज को बोने से पहले ब्रेसीकाल अथवा कावेनडाजिम की 2 ग्राम प्रति किलोग्राम की दर से शोधन कर लेना चाहिए। सूरजमुखी की फसल में 80-120 किग्रा. नत्रजन, 60 किग्रा फास्फोरस एवं 40 किग्रा. पोटाश प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करें । बुवाई के समय ही 200 किलोग्राम जिप्सम प्रति हैक्टर का प्रयोग अवश्य करना चाहिए। रासायनिक खरपतवार नियंत्रण हेतु पेन्डीमैथेलिन 30 प्रतिशत की 3.3 लीटर मात्रा का प्रति हैक्टर की दर से 600-800 लीटर पानी में घोलकर बुवाई के तुरन्त बाद अथवा जमाव से पहले बुवाई के 2-3 दिनों के अंदर छिड़काव करें ।

मेैंथा :- फरवरी माह में बोयी जाने वाली फसलों में मैन्था एक प्रमुख नगदी फसल है। उन्नतशील किस्मो – एम.एस. एस.-1,हाईब्रिड-77,गोमती, कोशी आदि का चुनाव करे। मैन्था के लिए मध्यम से लेकर हल्की भारी भूमि उपयुक्त रहती है। जल निकास का उचित प्रबंध आवश्यक है। मैन्था की बुवाई पूरे फरवरी माह में कर सकते हैं। बुवाई हेतु प्रति हैक्टर 400 से 500 किलोग्राम जड़े पर्याप्त होते हैं । जड़ों के 5 से 7 से.मी. लम्बे टुकड़े , जिसमें 3-4 गांठे हो, को काटकर 5-6 इंच की गहराई पर 45 से 60 सेमी. की दूरी पर बनी कतारों में बुवाई करें। बुवाई के समय 30 किलोग्राम नत्रजन,
75 किलोग्राम फास्फोरस तथा 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हैक्टर की दर से डालना चाहिए। बुवाई के तुरन्त बाद एक हल्की सिंचाई अति आवश्यक है। अन्य सिंचाइयाँ आवश्यकतानुसार 10-15 दिनों के अंतराल पर करते रहना चाहिए।

गन्ना का पेड़ी :- अच्छी पेड़ी लेने हेतु गन्ने की नौलख फसल की कटाई फरवरी के मध्य से शुरू करें। गन्ना की कटाई जमीन से सटाकर करना चाहिए। पेड़ी की फसल में सभी मुढ़ों का अंकुरण न होने की स्थिति में रिक्त स्थानों की भराई पूर्व में अंकुरित गन्ना के टुकड़ों या अन्य पेड़ी फसल के अंकुरित मूढ़ों से 15 दिन के अन्दर प्रथम या द्वितीय सिंचाई पर करना लाभदायक होता है।

फरवरी माह में पर्वतीय क्षेत्र होने में वाली फसले

गेहूँ जौ सिंचित दशा में बोये गये गेहूँ की फसल में पर्याप्त वर्षा न होने की स्थिति में फूल आने पर सिंचाई अवश्य करें । उपराऊ/उखड़ी क्षेत्रों में 2 प्रतिशत यूरिया के घोल का पर्णीय छिड़काव करें । रतुआ या गेरूई रोग एवं पर्ण झुलसा रोग नियन्त्रण के लिये प्रोपीकोनाजाल की 20 ग्राम मात्रा को 20 लीटर पानी में घोलकर प्रति नाली के हिसाब से आवश्यकतानुसार छिड़काव करें ।

चना, मटर,मसूर पानी की उपलब्धतानुसार फलियों में दाना आते समय सिंचाई की जानी चाहिए। यदि जाड़े की वर्षा हो जाये तो सिंचाई की आवश्यकता नहीं होगी। चना, मटर के पत्ती सुरंगक व फली छेदक कीट, मसूर के माहू कीट नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफास 36 ई.सी. की 15 मि. ली. दवा को 16-20 लीटर पानी में घोलकर प्रति नाली की दर से आवश्यकतानुसार छिड़काव करे । मटर के सफेद विगलन रोग की रोकथाम के लिए कावेनडाजिम की 10 ग्राम या घुलनशील गन्धक की 60 ग्राम मात्रा 16-20 लीटर पानी में घोलकर प्रति नाली के हिसाब से छिड़काव करें । मटर का चूर्णिल आसिता रोग नियन्त्रण के लिए सल्फेक्स की 40 ग्राम मात्रा या केराथेन की 10 ग्राम मात्रा को 16-20 लीटर पानी में घोलकर प्रति नाली की दर से छिड़काव करें ।
तोरिया/सरसों माहू कीट के नियन्त्रण के लिए मोनोक्रोटोफास 36 ई.सी. की 15 मि.ली. मात्रा को 16-20 लीटर पानी में घोलकर प्रति नाली की दर से छिड़काव करें । आवश्यकता पड़ने पर 15-20 दिन बाद पुनः छिड़काव करें । तोरिया की लगभग 75 प्रतिशत फलियां सुनहरी रंग की होने पर कटाई कर सकते हैं ।

फरवरी माह में मैदानी क्षेत्र में होने वाली सब्जिया

 आलू पिछेती फसल में 0.2 प्रतिशत इण्डोफिल-45 नामक दवा का घोल बनाकर छिड़काव करें । बीजवाली फसल की खुदाई करें । मध्यम आकार एवं बिना कटे आलूओं को बोरों में भरकर शीतभण्डार में भेजने की व्यवस्था करें ।

टमाटर ग्रीष्मकालीन फसल को रोपाई यदि अभी तक नहीं कर पायें हैं तो शीघ्र ही 60ग45 सेमी. की दूरी पर करें । खेत की आखिरी जुताई पर 100 किग्रा. नत्रजन, 80 किग्रा. फास्फोरस तथा 80 किग्रा. पोटाश प्रति हैक्टर से डालें । रोपाई सायंकाल में की जाये एवं रोपाई के तुरन्त बाद हल्की सिंचाई करें । जनवरी माह में रोपी गई फसल में 50 किग्रा. यूरिया/हे. की दर से डाले व जमीन में निराई करके मिलायें ।

बैंगन रोपाई के लिये यह समय उत्तम है। भूमि की तैयारी के समय 200-300 कुन्तल सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट भूमि में मिला देनी चाहिये। इसके अतिरिक्त 100 किग्रा. नत्रजन, 80 किग्रा. फास्फोरस तथा 80 किग्रा. पोटाश प्रति हैक्टर दर से दें। रोपाई 60ग45 सेमी. की दूरी पर करें । रोपाई सांयकाल के समय की जाये तथा रोपाई के तुरन्त बाद तुरन्त हल्की सिंचाई करें ।

मटर कीट एवं रोगग्रस्त फलियों को बाजार भेजने से पूर्व छांट दें। बीज वाली फसल से आवांछित पौधों को निकालें तथा चूर्णी फफूंदी नामक बीमारी के बचाव के लिये 0.06 प्रतिशत कैराथेन नामक दवा का घोल बनाकर छिड़काव करें । पकी फसल की अविलम्ब कटाई करें ।

फूलगोभी:- गोभी जब उचित आकार की हो जाये। तब उसकी कटाई करें । बीज वाली फसल में हल्की सी सिंचाई करें ।

पातगोभी अवांछित पौधों को निकालें तथा माहू के बचाव के लिये 0.15 प्रतिशत मैटासिस्टाक्स नामक दवा का छिड़काव करें ।

मूली, गाजर, शलजम बीजवाली फसल में 50 किग्रा. यूरिया प्रति हैक्टर की दर से डालें व हल्की सी सिंचाई करें व 0.15 प्रतिशत मेटासिस्टाक नामक दवा का छिड़काव करें । अवांछित पौधों को निकालें । सामान्य फसल से तैयार जड़ों की खुदाई करें ।

प्याज, लहसुन फसल में आवश्यकतानुसार सिंचाई, निराई व गुड़ाई करें व 50 किग्रा. यूरिया की खड़ी मात्रा फसल में डालें यदि अभी तक रोपाई नहीं की है तो अविलम्ब खेत की तैयारी करें व 20ग10 सेमी. की दूरी पर रोपाई करें । रोपाई के समय अवांछित पौधों को हटा दें । रोपाई सांयकाल में करें व तुरन्त बाद सिंचाई करें । फसल में आवश्यकतानुसार सिंचाई, निराई गुड़ाई करें व पौधों की वृद्धि अच्छी नहीं हो तो 50 किग्रा. यूरिया खड़ी फसल में डालें ।

पालक, मैथी व धनिया बाजार वाली फसल में से पत्तियों की कटाई करें व तुरन्त गड्डिया बांधकर बाजार भेजने की व्यवस्था करें । बीजवाली फसल से अवांछित पौधों को निकाले व निराई करें । कीटों से बचाव के लिये 0.2 प्रतिशत रोगोर नामक कीटनाशी का एक छिड़काव करें ।

भिण्डी, लोबिया, राजमा इस माह के पहले पखवाड़े इसकी बोआई करें तथा आखिरी जुताई पर 75 किग्रा. नत्रजन, 60 किग्रा. फास्फोरस तथा 60 किग्रा. पोटाश प्रति हैक्टर की दर से मिलाये । बोआई के समय जमीन में पर्याप्त नमी हो।

शिमला मिर्च जनवरी माह में रोपित फसल में निराई-गुड़ाई करें व 50 किग्रा. यूरिया खड़ी फसल में डालें । कीट तथा बीमारियों के बचाव के लिये 0.2 प्रतिशत इण्डोफिल-45 नामक दवा का एक छिड़काव अवश्य करें ।

खीरावर्गीय पूर्व में रोपित फसल में आवश्यकतानुसार निराई, गुड़ाई व सिंचाई करें ।

फरवरी माह में पर्वतीय क्षेत्र में होने वाली सब्जिया

आलू की अगेती बुआई हेतु भूमि ठीक प्रकार तैयार करें । खेत की तैयारी के समय 150 किग्रा. नत्रजन, 100 किग्रा फास्फोरस तथा 100 किग्रा. पोटाश दें । बीज हेतु छोटा आलू पूरा व बड़ा आलू काटकर प्रयोग करें। कटा टुकड़ा कम से कम 30-50 ग्राम का तथा दो या तीन आंखों वाला होना चाहिये। 45-60 सेमी. की दूरी पर बनी पक्तियों में आलू की बोआई 15-20 सेमी. की दूरी पर 5-7 सेमी. गहरी की जाये।

टमाटर घाटियों में टमाटर का बीज बोने का यह उचित समय है किन्तु मध्यम व अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में यह कार्य मार्च से शुरू करें ।पौधालय में पानी का उचित निकास की व्यवस्था करें ।बीज बुआई 15-20 सेमी. ऊंची उठी हुई क्यारियों में 10-15 सेमी. पर बनी पंक्तियों में इसके करे। तापक्रम बहुत कम होने की दशा में 15-20 सेमी. मोटी सूखी घास व पत्तों की अवरोध पर्त से पौधालय को ढक दें ।इससे जमाव शीघ्र व अच्छा होता है। ठंड से बचाने हेतु हाट बैड या बरसाती कागज का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। टमाटर की पूसा गौरव, पंत बहार, पन्त ट-3, पूसा हाइब्रिड-2 अच्छी किस्में हैं ।

शिमला मिर्च घाटियों में बोआई प्रारम्भ कर दें । ठीक प्रकार तैयार पौधालय में इसकी बोआई करें ।1-1.5 किग्रा. बीज प्रति हैक्टर रोपाई हेतु उपयुक्त है।

खीरा वर्गीय यह समय खीरावर्गीय सब्जियों की बुआई हेतु उपयुक्त है। साधारण रूप में 1.5ग1.0 मीटर के फासले से थाले बनायें । प्रत्येक थाले में 10-15 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद, 20-25 ग्राम यूरिया, 50 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट तथा 15 ग्राम म्यूरेट आफ पोटाश प्रत्येक थाले में मिला दें व 5-6 बीज प्रति थाला बोये ।

फराशबीन लीमाबीन माह के दूसरे पखवाड़े में फराश तथा लीमा बीन की बोआई हेतु भूमि की तैयारी करें । खेत की तैयारी के समय 25-30 टन सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हैक्टर मिला दें ।
अच्छी उपज के लिये 250 किग्रा. अमोनियम सल्फेट, 500 किग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 125 किग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश प्रति हैक्टर की दर से दें।लीमा बीन की पोेल किस्म को 1 मीटर के अन्तर पर थाले बनाकर उसमें 5-6 बीज बोयें बुश किस्मों के बीज 30-60 सेमी. के अन्तर की पंक्तियों में 5-7 सेमी. की गहराई मे बोयें बाद में पौधों को निकालकर पंक्तियों में अन्तर 15 सेमी. कर दें ।

फरवरी माह में मैदानी क्षेत्र में होने वाले फल

आम चूर्णित आसिता की रोकथाम हेतु कैराथेन(0.06 प्रतिशत) का छिड़काव करें ।श्यामवर्ण और छोटी पत्ती रोग के लिए क्रमशः ब्लाइटाक्स-50 1⁄40.25 प्रतिशत1⁄2 व जिंक सल्फेट 1⁄40.5 प्रतिशत1⁄2 का छिड़काव करे । भुनगा कीट की रोकथाम हेतु सेविन(0.2 प्रतिशत) का छिड़काव करें ।

केला पौधों की सूखी पत्तियों को निकाल कर बाग की 15 दिन के अन्तर पर दो सिंचाई करें । इस माह के अंत तक पोटाश व नाइट्रोजनधारी उर्वरकों का प्रयोग करके गुड़ाई कर दे । माहू की रोकथाम के लिए क्वीनालफास 25 ई.सी. का 1.0 ली. प्रति है. की दर से छिड़काव करें ।

नीबूवर्गीय फल मूलवृंत तैयार करने हेतु पौधशाला में बीजों की बुआई करें । पौधशाला में कली बांधने का कार्य प्रारम्भ करें । फलदार बागों में पोटाश व नाइट्रोजनधारी उर्वरकों का प्रयोग करके गुड़ाई कर दें । पर्ण सुरंगी कीट की रोकथाम के लिए डामिथोएट 30 ई.सी. 1⁄40.2प्रतिशत1⁄2 का छिड़काव करें । लेमन की कलमों की रोपाई पौधशाला में करें ।

अमरूद बीजू पौधे तैयार करने के लिये बीजों की पौधशाला में बोआई करें । पके फलों को तोड कर बाजार भेजें।

अंगूर पौधशाला में अंगूर की कलमों की रोपाई करके सिंचाई कर दें । श्यामवर्ण रोग की रोकथाम हेतु ब्लाइटाक्स-50 का छिड़काव करें । नए व फलदार बेलों में पोटाश व नाइट्रोजन  उर्वरकों का प्रयोग करके गुड़ाई करें ।

पपीता पिछले सीजन में लगाए गए पौधों में नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों का प्रयोग करके गुड़ाई कर दें फिर एक सिंचाई करें। फलों को तोड कर बाजार भेजें।

बेर बाग को साफ रखें ।फल बेधक कीट की रोकथाम के लिए मैलाथियान (0.5 प्रतिशत) का छिड़काव करें । अगेती किस्मों की तुड़ाई करें ।

लीची फलदार वृक्षों में पोटाश और नाइट्रोजन उर्वरकों का प्रयोग करके थालों की गुड़ाई कर दे । टहनियों पर छाल खाने वाली इल्ली के मल को साफ कर दें ।

लोकाट फल विगलन की रोकथाम के लिए ब्लाइटाक्स-50 (0.25 प्रतिशत) घोल का छिड़काव करें। फल छेदक कीट की रोकथाम के लिए मैलाथियान (0.2 प्रतिशत) घोल का छिड़काव करें ।

आंवला नए व फलदार वृक्षों में पोटाश व नाइट्रोजनधारी उर्वरकों का प्रयोग करके गुड़ाई कर दें ।

कटहल फलदार बागों में पोटाश व नाइट्रोजनधारी उर्वरकों का प्रयोग करें । पत्ती के काले धब्बे की
रोकथाम के लिए ब्लाइटाक्स-50 का छिड़काव करें।

फालसा पौध रोपाई का कार्य इस माह पूर्ण करके सिंचाई करें ।फलदार बागों में नाइट्रोजनधारी उर्वरकों का प्रयोग करके गुड़ाई कर दें ।

आडू पर्णकुंचन माहू की रोकथाम हेतु आक्सीडिमेटान मिथाइल 25 ई.सी. (0.2 प्रतिशत) का छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर करें ।

नाशपाती बाग में नाइट्रोजन व पोटाशधारी उर्वरकों का प्रयोग करके गुड़ाई कर दे ।

फरवरी माह में पर्वतीय क्षेत्रों में होने वाले फल

सेब ऊंचे स्थानों में नए बाग रोपाई का कार्य इस माह के मध्य तक कर दें।पौधों की सधाई का कार्य
पूर्ण करें। पोटाश व नाइट्रोजनधारी उर्वरकों का प्रयोग करके थालों की गुड़ाई करें ।थालों को पलवार से ढक दें।तना विगलन रोग से प्रभावित पेड़ों के थालों में बेनलेट (0.06 प्रतिशत) के घोल से सिंचाई करें । तने के प्रभावित भागों पर चैबटिया लेप लगा दें ।

नाशपाती – तदैव-

आड़ू पर्ण कुंचन की रोकथाम के लिए चूना गंधक ) 1:15) के घोल का छिड़काव करें ।

बादाम पर्ण कुचंन की रोकथाम के लिए चूना गंधक ) 1:15) के घोल का छिड़काव करें ।

अखरोट व अन्य पिछले माह यदि उर्वरकों का प्रयोग न किया गया हो, तो इस माह कर दें।
थालों में पलवार बिछा दें।

गिरीदार फल
कीवीफल बाग में पोटाश व नाइट्रोजनधारी उर्वरकों का प्रयोग करें ।

फरवरी माह में होने वाले पुष्प

गुलाब के सूखे फूलों व अनावश्यक अकुरों को तोड़ना, नये पौधे लगाना तथा बंडिग का कार्य। नियमित निराई-सिंचाई तथा माहूं के रोकथाम हेतु मोनोक्रोटोफास 0.04 प्रतिशत (1 मिली/लीटर) का
छिड़काव।

गलैडियोलस की मुरझाई हुई टहनियों को निकालना। स्पाइक के नीचे के फूल थोड़ा खिलने के बाद
डण्ठल को काटकर विपणन हेतु भेजना।

रजनीगन्धा के बल्बों के रोपण से 10-15 दिन क्यारियों में 10 किग्रा गोबर की खाद प्रतिवर्गमीटर तथा सिंगल सुपर फास्फेट तथा म्यूरेट आफ पोटाश प्रत्येक 80-100 ग्राम प्रतिवर्गमीटर की दर से बेसलडसिंग के रूप में प्रयोग।

मेंथा:- मेंथाके 10-12 दिन के अन्तर पर सिंचाई तथा बुआई के 30 दिन बाद निराई-गुड़ाई।

फल-सब्जी संर क्षण
इस माह आलू, फूलगोभी, मटर गाजर आदि सब्जिया के विभिन्न प्रकार के अचार, मोटी लाल मिर्च का भरवा अचार, आलू के चिप्स तथा पापड़ बनाया जा सकता है। गाजर व आवले का मुरब्बा तथा कैण्ड़ी टमाटर का कैचप तथा अन्य उत्पाद बनाए जा सकते हैं ।इसके अलावा जाड़े वाली सब्जियों को सुखाकर सुरक्षित किया जा सकता है।

पशुपालन

गाय-भैंस:- इन दिनों भैंस गर्मी पर आती हैं, गर्मी में आने के बाद उनकी अच्छे साँड़ से मिलाई कराये। वयस्क पशुओं को अंतः कृमि नाशक दवा पिलायें। 6 माह से कम उम्र के बच्चों को
मुहँपका-खुरपका रोग से बचाने हेतु टीका लगवायें।

भेड़ें व बकरी:- भेड़ बकरियों को पशु चिकित्सक के परामर्श के अनुसार कृमिनाशक दवा पिलायें ।
भैड़ों से।अच्छी और अधिक ऊन प्राप्त करने हेतु अच्छी नस्ल के भेड़ों से मिलायें ।

कुक्कुट:- बाह्य परजीवियों के लिए मुर्गियो की जाँच करें इसके होने पर चिकित्सक से परामर्श कर
दवा का उपयोग करें। मुर्गी घरों में दिन व रात मिलाकर 16 घण्टे रोशनी करें । रोशनी कम होने पर
मुर्गियाँ अण्डे कम देगी। अण्डा उत्पादन के लिए चूजे पालने का उपयुक्त समय है। अतः चूजे पालने
की व्यवस्था करें ।

मत्स्य:- खाद व उवर्रक का प्रयोग करें। कृत्रिम आहार की मात्रा बढा दें (3-4 प्रतिशत) । तालाब में
पानी का स्तर कम से कम 1 से 1.5 मी. बनाये रखें । जाल चलाकर मछलियों की बढ़ोतरी  की जाँच करें । व खाने योग्य बड़ी मछलियों की बिक्री करें ।

मौन:- यदि रानी मक्खी पुरानी हो गयी हो तो 15 फरवरी तक रानी को मार दें एवं नयी रानी का सृजन होने दें। नये मोम छत्ताधार मौन गृहों में दें जिससे मौन गृहों में भीड़ की स्थिति न हो। घरछूट एवं बकछूट से बचाने के लिए रानी मधुमक्खी के पंख कतर दें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *