आलू सब्जियों का राजा: तरीका सही या गलत ? कैसे कमाएं मुनाफा

आलू सब्जियों का राजा:
आलू की फसल – आलू को अगर सब्जियों का राजा कहें तो गलत नहीं होगा. हर सब्जी के साथ आलू अपना स्वाद बढ़ा लेता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से देखें तो आलू में कैल्शियम, लोहा, विटामिन-बी तथा फास्फोरस प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं.

आलू की फसल: तरीका सही या गलत

आलू एक ऐसी सब्जी है जिसकी खेती बहुत कम समय में किसानों को ज्यादा फायदा देती है. अफ़सोस जनक बात यह है किसान इस से ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने से चूक जाते हैं और इसका कारण है खेती का पुराना तरीका.

आलू की फसल

आलू की फसल

कैसे उगाएं आलू :
आलू को किसानों की खास नकदी फसल कहा जाता है. अन्य फसलों से तुलना करें तो आलू की खेती कर के कम समय में ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है. आलू के उत्पादन और कमाई को हम कई गुना बढ़ा सकते हैं अगर परम्परागत तरीके को छोड़ के वैज्ञानिक तकनीक से खेती की जाये.

आलू की खेती (आलू की फसल)के लिए उचित समय:
आलू की खेती सितंबर महीने के आखिरी सप्ताह से ले कर अक्तूबर महीने के दूसरे सप्ताह तक और मुख्य फसल अक्तूबर के तीसरे सप्ताह से ले कर जनवरी के पहले सप्ताह तक की जा सकती है.

आलू की फसल – उपयुक्त मिटटी:
आलू की फसल के लिए बलुई दोमट या दोमट मिट्टी अच्छी मानी जाती है. अप्रैल और जुलाई महीने के मध्य मिट्टी पलट हल से 1 बार जुताई कर ली जाती है. बुआई के समय फिर से मिट्टी पलट हल से जुताई कर ली जाती है. उस के बाद 2 या 3 बार हल या कल्टीवेटर से जुताई करने के बाद बोआई की जाती है.

आलू की फसल -कैसे करें बुआई :
आलू बोने से पहले बीज को कोल्ड स्टोरेज से निकाल कर लगभग १० से १५ दिनों तक छायादार जगह में रखा जाता है. खेत में उर्वरक डालने क बाद ऊपरी सतह को खोद कर उस में बीज डाला जाता है और ऊपर से मिटटी डाल देते हैं .पंक्तियों की दूरी लगभग ५० से ६० सेंटीमीटर होनी चाहिए, जबकि पौधों से पौधों की दूरी १५ से २० सेंटीमीटर होनी चाहिए.

खाद एवं उर्वरक का चयन :
प्राकृतिक खाद की बात करें तो खेत की जुताई के समय खेत में गोबर की खाद १५ से ३० टन प्रति हेक्टेयर की दर से मिला देनी चाहिए.
रासायनिक खादों का उपयोग भूमि की उर्वरा शक्ति, फसल चक्र और प्रजाति पर निर्भर होता है.कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार इन का इस्तेमाल किया जाना चाहिए.आलू की बेहतर फसल के लिए प्रति हेक्टेयर १५० से १७० किलोग्राम नाइट्रोजन, ५०-६० किलोग्राम फास्फोरस और १००-२०० किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है. फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा एवं नाइट्रोजन की आधी मात्रा बुआई के समय खेत में डाली जाती है. बची हुई नाइट्रोजन को मिट्टी चढ़ाते समय खेत में डाला जाता है.
इस प्रकार सही जानकारी के साथ समय के मांग को ध्यान में रखते हुए किसान अपने तरीके में थोड़ा आधुनिकता लाएं तो उपज एवं कमाई दोनों में फायदा होगा.

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