खस या वेटीवर(vetiver) की खेती कैसे करें??

vetiver(खस)
 खस या वेटीवर की खेती कैसे करें? साधारण नाम- खस, वेटीवर वानस्पतिक नाम- kraisopogan जिजैनियोइडिस उन्नत किस्में- के एस- 1, के एस- 2, धारिणी, केशरी, गुलाबी, सिम-व्रद्धि, सीमैप खस- 15, सीमैप खस- 22, सीमैप खुशनलिका। उपयोग- जड़ो से प्राप्त सुगन्धित तेल, कास्मेटिक, साबुन एवं इत्र आदि में प्रयोग किया जाता है। इसका तेल उच्च श्रेणी का स्थिरक होने के कारण चन्दन, लेवेंडर एवं गुलाब के तेल पर ब्लेंडिंग में प्रयोग होता है। इसके अतिरिक्त तम्बाकू, ...
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जानिये कैसे होती है मक्का की खेत की स्थापना एवं प्रमुख रोग नियत्रंण प्रबंधन

मक्का
मक्का, धान एवं गेहूँ के बाद तीसरी मुख्य खाद्यान्न फसल हैं, इसे पोपकोर्न, स्वीटकोर्न, ग्रीनकोर्न एवं बेबीकोर्न के रूप में पहचान मिल चुकी है। इसके अतिरिक्त इसे खाद्य तेल, रातिब, शराब आदि में भी उपयोग में लाया जा रहा है। मक्का को अनाज, दाना एवं चारे के रूप में सदियों से प्रयागे में लाया जा रहा है। मक्का की प्रजातियों का चुनाव मक्का की प्रजातियों को पकने के आधार पर तीन मुख्य भागों में बाँटा गया है। 1.अगेती या शीघ्र पकने वाली प्रजातियां (75-80 दिन अवधि)- ये प्रजातियां बाढ़ ग्रस्त एवं असिंचित क्...
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राइसबीन की खेती मे अधिकतम उत्पादन एवं फसल सुरक्षा हेतु ध्यान देने योग्य विशेष बिन्दु।

पर्वतीय क्षेत्रों के लिए राइसबीन एक उपयुक्त फसल है। मध्य एवं ऊॅचाई (1500-2200 मी. तक) वाले क्षेत्रों में जहाँ पर दूसरी दलहनी फसल जैसे उर्द, मूँग , अरहर आदि उगाना सम्भव नहीं होता है, वहॉ राइसबीन की फसल सुगमतापूर्वक उगाई जा सकती है। पर्वतीय क्षेत्रों में इसे नौरंगी तथा रगड़मांस आदि नामों से जाना जाता है। आमतौर पर राइसबीन की फसल मिश्रित खेती के रूप में ली जाती है। परन्तु इसकी शद्धु खेती अधिक लाभदायक होती है। ‘‘राइसबीन-गेहूॅ’’ एक आदर्श फसल चक्र है जिससे गेहुँ की फसल को वांछित नत्रजन की मात्रा का क...
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जाने सूरजमुखी( Sunflower) की उन्नत खेती कैसे करे ?

सूरजमुखी
उन्नत किस्में सकंर किस्में                           पकने की अवधि  (दिन)                     उपज  (कु./है. ) एस.एस.एच.-6163                            90-95                                               20-22 एन.एस.एफ.एच.-36                         90-95                                                22-24 पी.ए.सी.-3776                                  95-100                                             22-24 सुपर ज्वालामुखी                                105-110                             ...
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जाने तिल( Sesame – Seed) की उन्नत खेती कैसे करे ?

तिल
तिल की उन्नत किस्में घाटी वाले क्षत्रे (1000 मीटर) तथा तराई एवं भावर क्षत्रे के लिए निम्न प्रजातियाँ हैं। प्रजातियाँ       पकने की अवधि (दिन)           उपज(कु./है.) टा-4                    90-100                                    6-7 टा-12                   85-90                                      5-6 टा-78                   80-85                                     6-7 शेखर                    80-85                                     6-7 प्रगति                    85-90            ...
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सोयाबीन की खेती (Soybean Cultivation) मे अधिकतम उत्पादन एवं फसल सुरक्षा हेतु ध्यान देने योग्य विशेष बिन्दु

सोयाबीन की खेती
सोयाबीन  की खेती : उत्तराखण्ड में सोयाबीन  खरीफ की मुख्य तिलहनी फसल है। सोयाबीन में 20 प्रतिशत तेल व 40 प्रतिशत प्रोटीन पाई जाती है। सोयाबीन से दूध, दही, पनीर, आटा, नमकीन एवं कई अन्य प्रकार के व्यजंन भी बनाये जाते  है। सोयाबीन की खेती मैदानी क्षेत्रों में अभी हाल में ही कुछ वर्षो से शुरू हुई हैI इसमे 40 से 50 प्रतिशत प्रोटीन तथा 20 से 22 प्रतिशत तक तेल की मात्रा पाई जाती हैI इसके प्रयोग से शरीर को प्रचुर मात्रा में प्रोटीन मिलती हैI प्रदेश के बुंदेलखंड के सभी जनपदों एवम बदाऊ, रामपुर, बरेली, शा...
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काकुन( कौणी ) के अधिकतम उत्पादन एवं फसल सुरक्षा हेतु ध्यान देने योग्य विशेष बिन्दु।

पर्वतीय क्षेत्रों में उगाये जाने वाले मोटे अनाजों में काकुन का तीसरा स्थान है। यहाँ इसे कौणी के नाम से जाना जाता है। इसकी खेती मैदानी तथा समुद्र तल से 2200 मीटर की ऊँचाई तक की जाती है। अधिकांशत: काकुन को झंगोरा के साथ मिश्रित खेती के रूप में बोया जाता है। काकुन की उन्नत किस्में पी.आर.के.-1 पतं नगर विश्वविद्यालय के पर्वतीय परिसर, रानीचौरी (टिहरी) द्वारा हाल में विकसित की गई जो कि एक अगेती किस्म है। यह किस्म पर्वतीय क्षेत्रों में 1500-2200 मी. की ऊंचाई तक उपयुक्त पाई गई है। एक हेक्टेयर भूमि में ...
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मूंग (green gram) की बुवाई का उपयुक्त समय एवं अधिकतम उत्पादन हेतु ध्यान देने योग्य विशेष बिन्दु।

मूंग
मूंग- बुवाई का समय पर्वतीय क्षत्रेा में मूंग की बुवाई का उपयुक्त समय घाटिया में जून का द्वितीय पखवाडा़ है। विलम्ब से बुवाई करन पर उपज में कमी आ जाती है। तराई-भावर एव मैदानी क्षत्रेा में मूंग की बुवाई का सर्वाेत्तम समय जुलाई क अन्तिम सप्ताह से अगस्त का दसूरा सप्ताह है। जायद में बुवाई का उचित समय मार्च के द्वितीय पखवाड से 10 अप्रैल तक है। तराई क्षत्रे में मूंग की बुवाई मार्च क अतं तक कर लनेी चाहिए। बुवाई की विधि बुवाई कॅूड में हल के पीछ कर। पंक्ति से पंक्ति की दरूी 30-45 स.मी. हानेी चाहिए। ...
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मंडुवा(कोदा/रागी) के अधिकतम उत्पादन एवं फसल सुरक्षा हेतु ध्यान देने योग्य विशेष बिन्दु।

मंडुवा
कोदा / मंडुवा:- मंडुवा को अलग-अलग नामों से जाना जाता है , कन्नड़ नाम रागी है| अंग्रेजी -फिंगर मिलेट कहते हैं | गढ़वाल , कुमांऊँ में मंडुवा/कोदा नाम ज्यादा प्रचलन में है | इसे उपेक्षित मोटे अनाज की श्रेणी में रखा है जबकि यह सबसे बारीक है और दुनिया में जितने अनाज हैं , उनमें पौष्टिकता की दृष्टि से मंडुवा सबसे सिखर पर है | स्त्री , पुरुष , बच्चों एवं बूढों सबके लिए यह बहुत उपयोगी है | बढ़ते बच्चों के लिए तो यह और भी उपयोगी है , क्योंकि इसमें सबसे ज्यादा कैल्शियम पाया जाता है | पर्वतीय असि...
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जौ(Barley) की उन्नत प्रजातियाँ , पैदावार कुन्तल/हेक्टेयर एवं विशेषताए|

जौ
जौ एक खाद्यान्न एवं औद्योगिक फसल है। इसका उपयागे मानव, पशुओं के चारे व दाने में एवं बियर आदि बनाने में किया जाता है। असिंचित दशा में जौ की खेती गेहूँ की अपेक्षा अधिक लाभपद्र है। भूमि एवं जलवायु अच्छे जल निकास वाली दोमट भूमि में जौ की फसल अच्छी होती है। रेतीली एवं कमजोर भूमि में भी यह सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। जौ जल भराव के प्रति गेहूँ की अपेक्षा अधिक संवेदनशील है। अम्लीय भूमि जौ के लिए अनुपयुक्त है। जौ शीतोष्ण जलवायु की फसल है। गर्म जलवायुवाले क्षेत्रों में इसकी खेती ठंडे (रबी) मौसम मे...
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