नवम्बर माह में मैदानी क्षेत्र एवं पर्वतीय क्षेत्र में होने वाली फसले, फल, पुष्प, पशुपालन।

नवम्बर माह में मैदानी क्षेत्र में होने वाली फसले धान, उर्द  व मूगं देर से बोई गई  फसल की कटाई कर लें और सुखाकर भंडारण की व्यवस्था करें। मूगंफली देर से बोई गई फसल की खुदाई  करें। अरहर शीघ्र पकने वाली किस्मों  की 75-80 प्रतिशत फलियां पकने पर कटाई कर लें। लम्बी अवधि की किस्मों में फलीछेदक कीट के रोकथाम के लिए मोनाक्रोटोफेास (36 एस.एल.) 1250 मिली. या डाइमेथाऐट 3. 0 इ.सी. 660 मिली.लीटर दवा को आवश्यक पानी में  मिलाकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करें। ताेरिया दाना भरने की अवस्था में यदि ...
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अक्टूबर माह में मैदानी क्षेत्र एवं पर्वतीय क्षेत्र में होने वाली फसले, फल, पुष्प, पशुपालन।

अक्टूबर माह में मैदानी क्षेत्र में होने वाली फसले धान जो किस्में पक गई हो। उनकी कटाई कर लें। कटाई जड़ सेे सटाकर करें। भण्डारण हेतु दानों में नमी 12-14 प्रतिशत रखनी चाहिए। दरे से बोई गई फसल में फूल बनते समय खते में सिचांई  अवश्य करे। कभी-कभी गधी बगं का प्रकोप हो जाता है । इसकी रोक थाम के लिये इमिडाक्लाेिपड्र 17.8 एस.एल. का 150 मिली. या मोनोक्रोटाफास 36 एस. एल. का 1.4 मिली मात्रा प्रति हैक्टेयर  का फूल आने के बाद बूरकाव प्रात़ः या शाम को करें। मक्का समय से बोई गई फसल की  कटाई करे। सकंर व विजय मक...
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प्रमुख फफूंदीनाशी रसायन एवं उनका उपयोग करने की प्रक्रिया

फफूंदीनाशी रसायन
मैंकोजेब यह डाईबियोकार्बा मेट ग्रुप का एक स्पर्शजन्म फफूंदीनाशी है। यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं विविध उपयागे वाला कवकनाशी रसायण है जो 75 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण के रूप में आता है इस उपयागे मुख्य रूप से पत्ती धब्बा झुलसा श्यामवर्ण, रतुआ,तुलासिताआदि रोगो से बचाव हेतु सुरक्षात्मक छिड़काव के लिए किया जाता है। इसकी 2 से 2.5 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर 7 दिन के अन्तराल पर किया जाता है। यह बाजार में डाइथने एम-45, इण्डोफिल एम-45, एमगार्ड, कोरोथेन, यूथेन इत्यादि व्यवसायिक नामों से...
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जानिये सूक्ष्म पोषक तत्वों का महत्व, कमी के लक्षण एवं उपचार

सूक्ष्म पोषक तत्वों का महत्व
अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की भाँति सूक्ष्म पोषक तत्व भी पौधों की बढ़वार एवं उनसे प्राप्त होने वाली उपज पर प्रभाव डालते है। यद्यपि सूक्ष्म पोषक तत्वों की आवश्यकता फसल को कम मात्रा में ही होती हैं परन्तु इसका तात्पर्य है कि इनकी महत्ता कम है कदापि सत्य नहीं है। सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी होने पर उपज एवं उत्पाद की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। इसके अतिरिक्त इनकी कमी होने पर भरपरू मात्रा में नत्रजन, फोस्फरस एवं पोटाश उर्वरकों के प्रयोग करने पर भी अच्छी उपज नहीं प्राप्त होती है। सूक्ष्म पोषक तत्...
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मुख्य पोषक तत्वों का महत्व, कमी के लक्षण एवं विभिन्न फसलों हेतु ध्यान देने योग्य विशेष बिंदु

पोषक तत्वों
पौधों की वृद्धि के लिए 18 पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। ये पोषक तत्वों को मिट्टी, पानी एवं वायुमण्डलीय गैसों द्वारा पौधों को प्राप्त होते है। इन 18 पोषक तत्वों में से कुल 6 पोषक तत्व मुख्य पोषक तत्वों की श्रेणी में आते हैं जैसे- नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम एवं सल्फर। यदि मिट्टी में इन आवश्यक पोषक तत्वों की कमी हो जाती है तो पौधों अपना जीवन-चक्र सफलतापूर्वक पूरा नहीं कर पाते है। मुख्य पोषक तत्वों की कमी के लक्षण पौधों में पोषक तत्वों की कमी या असन्तलु न अव्यवस्था ...
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जानिये कैसे होती है मक्का की खेत की स्थापना एवं प्रमुख रोग नियत्रंण प्रबंधन

मक्का
मक्का, धान एवं गेहूँ के बाद तीसरी मुख्य खाद्यान्न फसल हैं, इसे पोपकोर्न, स्वीटकोर्न, ग्रीनकोर्न एवं बेबीकोर्न के रूप में पहचान मिल चुकी है। इसके अतिरिक्त इसे खाद्य तेल, रातिब, शराब आदि में भी उपयोग में लाया जा रहा है। मक्का को अनाज, दाना एवं चारे के रूप में सदियों से प्रयागे में लाया जा रहा है। मक्का की प्रजातियों का चुनाव मक्का की प्रजातियों को पकने के आधार पर तीन मुख्य भागों में बाँटा गया है। 1.अगेती या शीघ्र पकने वाली प्रजातियां (75-80 दिन अवधि)- ये प्रजातियां बाढ़ ग्रस्त एवं असिंचित क्...
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राइसबीन की खेती मे अधिकतम उत्पादन एवं फसल सुरक्षा हेतु ध्यान देने योग्य विशेष बिन्दु।

पर्वतीय क्षेत्रों के लिए राइसबीन एक उपयुक्त फसल है। मध्य एवं ऊॅचाई (1500-2200 मी. तक) वाले क्षेत्रों में जहाँ पर दूसरी दलहनी फसल जैसे उर्द, मूँग , अरहर आदि उगाना सम्भव नहीं होता है, वहॉ राइसबीन की फसल सुगमतापूर्वक उगाई जा सकती है। पर्वतीय क्षेत्रों में इसे नौरंगी तथा रगड़मांस आदि नामों से जाना जाता है। आमतौर पर राइसबीन की फसल मिश्रित खेती के रूप में ली जाती है। परन्तु इसकी शद्धु खेती अधिक लाभदायक होती है। ‘‘राइसबीन-गेहूॅ’’ एक आदर्श फसल चक्र है जिससे गेहुँ की फसल को वांछित नत्रजन की मात्रा का क...
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जाने सूरजमुखी( Sunflower) की उन्नत खेती कैसे करे ?

सूरजमुखी
उन्नत किस्में सकंर किस्में                           पकने की अवधि  (दिन)                     उपज  (कु./है. ) एस.एस.एच.-6163                            90-95                                               20-22 एन.एस.एफ.एच.-36                         90-95                                                22-24 पी.ए.सी.-3776                                  95-100                                             22-24 सुपर ज्वालामुखी                                105-110                             ...
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जाने तिल( Sesame – Seed) की उन्नत खेती कैसे करे ?

तिल
तिल की उन्नत किस्में घाटी वाले क्षत्रे (1000 मीटर) तथा तराई एवं भावर क्षत्रे के लिए निम्न प्रजातियाँ हैं। प्रजातियाँ       पकने की अवधि (दिन)           उपज(कु./है.) टा-4                    90-100                                    6-7 टा-12                   85-90                                      5-6 टा-78                   80-85                                     6-7 शेखर                    80-85                                     6-7 प्रगति                    85-90            ...
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काकुन( कौणी ) के अधिकतम उत्पादन एवं फसल सुरक्षा हेतु ध्यान देने योग्य विशेष बिन्दु।

पर्वतीय क्षेत्रों में उगाये जाने वाले मोटे अनाजों में काकुन का तीसरा स्थान है। यहाँ इसे कौणी के नाम से जाना जाता है। इसकी खेती मैदानी तथा समुद्र तल से 2200 मीटर की ऊँचाई तक की जाती है। अधिकांशत: काकुन को झंगोरा के साथ मिश्रित खेती के रूप में बोया जाता है। काकुन की उन्नत किस्में पी.आर.के.-1 पतं नगर विश्वविद्यालय के पर्वतीय परिसर, रानीचौरी (टिहरी) द्वारा हाल में विकसित की गई जो कि एक अगेती किस्म है। यह किस्म पर्वतीय क्षेत्रों में 1500-2200 मी. की ऊंचाई तक उपयुक्त पाई गई है। एक हेक्टेयर भूमि में ...
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