धान में  होने वाले हानिकारक कीटों का प्रबंधन।

धान में प्रभावी कीट प्रबंधन धान हेतु मुख्य कीटों के आर्थिक कगार सारणी-1 में दिया जा रहा है। धान के हानिकारक कीट से होने वाली हानि के लक्षण एवं इनके प्रबंधन हेतु संस्तुत कीटनाशी रसायनों का विवरण सारणी-2 में दिया गया है। रसायनों का दूसरा छिड़काव 7-10 दिन पर करे ।  प्रत्येक छिड़काव में एक ही रसायन का प्रयोग नहीं करे।

धान के हानिकारक कीट

धान के हानिकारक कीट

धान की फसल में धान के हानिकारक कीट का आर्थिक  कगार स्तर (सारणी-1)

कीटों का नाम आर्थिक कगार स्तर
धान का हिस्पा 2 प्रौढ़ या दो ग्रसति पत्तियॉ प्रति हिल
भूरा फुदका, सफेद पीठ वाला फुदका कल्ले फूटते समय 8-15 फुदके/पौधा
तना छेदक प्रति वर्ग मीटर 5-8 मृत गोभ अथवा एक अण्ड़ समूह
पत्ती लपेटक 8-10 पत्तियॉ प्रति हिल ग्रसित हों
गंधी बग हिल फूल आने के बाद 2-3 गंधी बग प्रति
बाली काटने वाले कीट औसतन 4-5 सुंड़ी प्रति वर्ग मीटर

धान के हानिकारक कीट व प्रबंधन हेतु संस्तुत कीटनाशी रसायन (सारणी-2)

 

कीटों का नामया हानि के कारण संस्तुत कीटनाशी रसायन एवं प्रयोग विधि
धान का हिस्पा : अधिक वर्षा के क्लोरपायरीफास 20 ई.सी. के 1.25 लीटरबाद थोड़े समय सूखा मौसम होने या टांइजोफास 40 ई.सी. के 700 मि.मी. या ,पर छोटा, काले रंग के कीट जिसके शरीर पर छोट – छोटे कॉटे होते है ,पत्तियों को खुरच कर खाते है।पत्तियों पर सफेद समान्नतर रेखाएंबन जाती है। क्लोरपायरीफास 20 ई.सी. के 1.25 लीटरबाद थोड़े समय सूखा मौसम होने या टांइजोफास 40 ई.सी. के 700 मि.मी. या मोनोक्रोटोफॉस 36 एस.एल. के 1.4 लीटर/है.को 500 लीटर पानी में घोलकर छिड़कावकरे ।
भूरा फुदका, सफेद पीठ वालाफुदकाः यह छोटा हरा या भूरारंग का होता है। यह तनें एवंपत्तियों का रस चुसतें है ।,समूह मेंपौधे पीले एवं बाद में जले हुएगोलाई में दिखते हैं। बुप्रोफेजिन 25 एसी के 1 लीटर याथियामेथोक्जाम 20 डब्लयू.एस.जी. के 100ग्राम या एसिटामिप्रिड 20 एस.पी. के 100ग्राम या क्लोथियानिडिन 50 डब्लयू.डी.पी. के30 ग्राम/है. को 500 लीटर पानी में घोलकरतने के पास जहॉ कीट रस चूसते है ,,छिड़कावकरे।
तना छेदक : कीट की सूड़ियोंपीले या मटमैले रंग की चिकनीसी होती है। यह तने में छेदकरअन्दर ही अन्दर खाती हैं मृष्तगोभ बनता है। अगर प्रकोप बालीबनते समय होता है तो बालियॉसफेद निकलती हैं तथा दाने नहींबनते हैं। फसल की प्र|रम्भिक अवस्था मेक्लोराटंनिलिप्रोले 0.4 जी के 10 किग्रा./हैया फिप्रोनिल 0.3 जी के 25 किग्रा0/है याकारटाप हाइडां क् े लोराइड 4 जी के 20 किग्रा./ की दर से खेत में बुरकाव करे। इससमय खेत में 3-5 सेमी. पानी होना चाहिए।यदि कीट का प्रकोप रोपाई के 45-50 दिनबाद हो तो क्लोराटांनिलिप्रा ल 20 एस.सी. के150 मिली./है. या फ्लूबेन्दिडयामाइड 480एस.सी. के 70 मिली./है. या फिप्रोनिल 5एस.सी. के 1.0 लीटर/है. या कारटापहाइडोंक्लोराइड 50 डब्ल्यू डी.पी. के 600ग्राम/है. या क्लोरपाइरीफास 20 ई.सी. के2.5 लीटर/है. को 500-600 लीटर पानी मेंघोलकर छिड़काव करे । रोपाई के 15 दिन केअन्दर 25 मीटर × 10 मीटर की दूरी परपौधों के ऊपरी सतह से 30 से.मी. ऊँचाई परफेरोमोन प्रपंच लगाकर बिना कीटनाशीरसायन के ही इस कीट का नियंत्रण कियाजा सकता है। प्रपंच में 3 मिग्रा. के ल्यूर को20-25 दिन के अंतराल में बदलना चाहिए।
पत्ती लपेटकः सूंडी पत्ती कोबेलनाकार आकृति में लपेटती हैतथा हरे भाग को खाती है। कीट प्रबंधन हते क्लारेट्रानिलिप्राले 20 एससी. के 150 मिली./है. या करटाप हाइड्रोक्लोराइड 50 डब्ल्यू डी.पी. के 600 गा्रम/ह. या फ्लबूेन्दडयामाइड 480 एस.सी.क 75 मिली./है. को 500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
गंधी बगः कीट शिशु तथा प्रौढ़ बाली की दुग्धावस्था में दानों सेरस चुसते है जिससे दाने बनते है। कीट प्रबंधन हेतु मैलाथियान 5 प्रतिशत या फन्थाऐटे 2 प्रितशत या फनेवलेरटे 0.4 प्रितशत क 20-25 किगा्र./है का बरुकाव पा्रतः अथवा सॉयकाल कम हवा क बहाव के समय करना चाहिए।
बाली काटने वाले कीटः सूडयॉ धान के पकने के समय सॉयकालपौधों पर चढ़कर बाली को 2-3टुकड़ों में काट कर जमीन परगिरा देती है। कीट प्रबंधन हेतु क्लोरपाइरीफास 20 ई.सीक 1.5 लीटर/है. या क्यनूलफास 25 इ.र्सीके 1.5 लीटर/है. या डाईक्लोरफास 76 ईसी. के 0.5 लीटर/है. या क्यूनालफास 1.5 डी. के 25-30 किग्रा./है. का सॉयकाल में छिडक़ाव/बरुकाव करना चाहिए।
दीमकः दीमक के श्रमिक जड़एवं तने को खाकर सुखा देते है।प्रकोपित सूखे पौधे आसानी से उखड़ आते हैं। इसका प्रकोप असिंचित दशा में होता है। कीट प्रबंधन हेतु कच्चे गोबर की खाद का प्रयागे न करे फसल अवशेष को नष्ट करे खडी़ फसल मे पक्रापे हाने पर क्लारेपाइरीफास 20 इ.र्सी. क 5 लीटर/है. का 25 किगा्र बालू में मिलाकर समुचित नमी पर सॉयकाल में बुरकाव करना चाहिए।
कुरमुलाः कीट के गीडार फसल को हानि पहुंचाते है। इसका प्रकोप असिंचित दशा में होता है। कच्चे गाबेर की खाद का पय्रागे न करे खते की तैयारी के समय 8 कुन्तल नीम की खली/है. का प्रयोग करें। खड़ी फसल में क्यूनालफास 25 ई.सी. या क्लोरपाइरीफास 20 ई.सी. के 4 लीटर रसायन को बालू या राख में मिलाकर बुरकाव करें।

धान की फसल में  होने वाले रोगों का प्रबंधन

अपने क्षेत्र के प्रमुख  रोगों को ध्यान में रखकर रोग प्रतिरोधी/सहिष्णु प्रजातियों के प्रमाणित बीजों की समय से बुवाई/रोपाई करें ताकि रोगों के अधिक प्रकोप होने पर नुकसान न्यूनतम हो। संस्तुलित उर्वरकों का प्रयोग करे ।  स्वयं उत्पादित बीजों की बुवाई बीज शोधन के उपरान्त करे । खेत की लगातार निगरानी करे । रोग के लक्षण दिखाई देते ही शीध्र जॉचकर रोगनाशी रसायनों का प्रयोग संस्तुत मात्रा एवं विधि से करें तथा रोग के प्रकोप को कम करने के लिए संस्तुत सस्य क्रियाओं पर विशेष बल दे । विभिन्न रोगों के लक्षण एवं प्रबंधन हेतु संस्तुत रसायनों का विवरण सारणी-3 में दिया जा रहा है।

धान के प्रमुख रोगों के लक्षण एवं प्रबंधन के उपाय (सारणी 3)

कीटों का नामया हानि के कारण संस्तुत कीटनाशी रसायन एवं प्रयोग विधि
सफेदा रोगः यह रोग नर्सरी में लोह तत्व की कमी से लगता है। पत्तियॉ पीली पड़कर बाद में सफेद कागज सा पतला होकर सूख जाती है।  उपचार हते 5 किग्रा. फरेस सल्फटे तथा 20 किग्रा. यूरिया या 5 किग्रा. बुझे चूने के साथ 1000 लीटर पानी/    है. की दर से छिड़काव करे |
खैरा रोगः जस्ते की कमी के कारण पत्तियों पर हल्के पीले रंग के धब्बे बन जाते है जो बाद में कत्थई रंग के हो जाते है। पौधा बौना हो जाता है एवं व्यांत कम होती है। लक्षण दिखाइ र्दते ही 5 किगा्र. जिकं सल्फटे को 20 किग्रा. यूरिया अथवा 2.5 किग्रा. बुझे चनू को 1000 लीटर पानी म मिलाकर /है10 दिन के अतंराल पर 2-3 छिडक़ाव करे |
झोंका रोगः पत्तिया, तना, बालियां आदि पर ऑख की आकृति के धब्बे बनते हैं जो बीच में राख के रंग के तथा किनारे गहरे भूरे रंग के होते हैं। बालियों पर प्रकोप होने पर बालियॉ टूट सकती हैं। बीजो को बौने से पहले थीरम एव काबर्ण्डाजिम (2:1) के 3 गा्रम प्रित किलागे्रम बीज की दर से बीजोपचार करना चाहिए। पत्तिया पर रागे के लक्षण दिखाइ र्द ता एक छिड़काव बाली निकलते समय तथा दूसरा आवश्यकतानसुर 500 गा्रम काबर्ण्डाजिम 50 डब्लयपी अथवा टा्रइसाइक्लजेले 75 डब्लयू पी के 500-600 ग्राम अथवा इडिफेनफास 50 ई.सी. के 750 मिली./है को 500 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। फसल में नत्रजन की सस्ंततु मात्रा का ही पय्रागे कर | खेत से पानी निकाल दें।
जीवाणु झलुसाः यह जीवाणु जनित रागे है | पत्तिया किनारे अथवा नाके से सुखने लगती ह। सख् हएु किनारे अनियमित एवं टेढ़े मेढ़े होते है गम्भीर रुप से सवंमित झुलस कर मर जाते है।  नाइट्रोजन कीमात्रा को राके द। आवश्यक होता 15 ग्राम स्टेप्टोसाइक्लिन 500 ग्राम कापर आक्सीक्लोराइड को 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टयर की दर से छिड़काव करें। 7-10 दिन पर पुनः छिड़काव करें।
भूरी पर्ण चित्ती रोगः पत्तियों पर गोला कार भूरे रंग के धब्बे बनते है। पौधों की बढ़वार कम होती है एवं दाने भी प्रभावित हो जाते हैं। इससे बीज के अंकुरण क्षमता में कमी आती है। संतुलित उर्वरक का प्रयोग करें। बीज को शोधित कर ही बुवाई करें। रोग प्रकट होने पर इडिफेनफास 50 ई.सी. के 500-600 मिली. या कापर आक्सीक्लारेइड 500 डब्लयू पी के 1250 ग्राम/है. का छिड़काव करें।
शीथ ब्लाइटः पर्णच्छद पर पानी की सतह क ऊपर 2-3 समे. लम्बे या पुआल क रगं के क्षत स्थल बन जात है। क्षत स्थल बढकर तना को चारों ओर से घेर लेते है। रोग लक्षण दिखाई देते ही प्रोपेकोनेजाल 500 मिली./है. अथवा हैक्साकोनेजोल 1 लीटर/है. की दर से छिड़काव करें। 10 दिन के अंतराल पर दूसरा छिड़काव करें।
आभासी कंडः इसमें दाने भूरे, हरे, पीले अथवा काले रंग के गोल-गोल आकार के हो जाते है। दाने कंही-कंही ही बनते है। रोग के प्रबंधन हेतु प्रथम छिड़काव बाली निकलते समय प्रोपेकोनेजाल 1 मिली/हैअथवा क्लारेथ्लेिनल 2 गा्रम/लीटर पानी के साथ करें। दूसरा छिड़काव बालियों के पूर्णतः बाहर निकलने के बाद करें।
बैकनी/तल विगलनः पौधे पौधशाला में पीले रंग के हो जाते है। इस प्रकार के लम्बे पौध की रौपाई न करें।

जब बालियों के 80 प्रतिशत दाने पुआल के रंग के हो जाये तथा बाकी 20 प्रतिशत 1⁄4बाली की जड़ के पास1⁄2 कठोरावस्था में हो तथा पौधे पीले हो जाये तब समझ लेना चाहिए कि फसल काटने का यही उचित समय है। प्रायः बाली बनने की अवस्था के 60-65 दिन के अंदर ही फसल कटाई  योग्य हो जाती है। फसल की कटाई जल्दी करने से अपूर्ण विकसित दानों के कारण धान की उपज कम मिलती है तथा चावल में टूटे चावल की मात्रा ज्यादा हो जाती है ।  इसी प्रकार विलम्ब से कटाई करने पर दानों के झड़न , फसल के गिरने, चूहों तथा चिड़ियों द्वारा फसल को नुकसान तो होता ही है साथ ही अधिक धूप के कारण दानों में टूट आ जाती है और कभी कभी उस समय वर्षा के कारण दाने पौधें में ही जमने लगते है। अतः चावल की गुणवत्ता में भी कमी असमय आ जाती है।

धान की फसल की कटाई से 10-15 दिन पहले ही सिंचाई बन्द कर देनी चाहिए। इससे दानों में नमी की मात्रा करीब 20 प्रतिशत हो जाती है तथा करीब 16 सेमी. सिंचाई की बचत होती है और 2-3 दिन पहले फसल काटने योग्य हो जाती है।

धान की कटाई जमीन से सटाकर करनी चाहिए। इससे यह फायदा होता है कि फसल के ढूढ़ से धान के तना छेदक कीट के लारवा एवं प्यूपा को चिड़ियॉ चोच से निकाल कर खा जाती है। इससे इस कीट का प्रकोप अगली फसल में कम होता है। धान की कटाई के बाद बिना जुताई के ही गेहू की बुवाई जीरो टिल फर्टि सीड़ डिंल द्वारा करने मे आसानी रहती है। खेत में ढूढ़ की अधिक मात्रा होने पर रबी फसलों में आरम्भिक अवस्था में ढूंढ के सड़ने के समय पीलापन आ जाता है।

अगर दानों में नमी अधिक हो तो कटी हुई फसल को खेत में ही 1-2 दिन के लिए सूखने दे ।  अन्यथा उसी दिन फसल की गहाई करे । दानों के ढेर को ओस में खुला न छोड । अगर रात में खुला रखना ही पड़े तो ढेर को पालीथीन के चादर से ढक दे । क्यो क जो दाने ओस में पड़े रहते हैं दिन में सूर्च की गर्मी से उनमें पतली दरार पड़ जाती है तथा चावल टूटता है।

उपज

उन्नत विधियॉ अपनाकर समान्यतः असिंचित क्षेत्र में 25-30 कुन्तल प्रति हैक्टर तथा सिंचित क्षेत्रों में 40-50 कुन्तल प्रति हैक्टर तक उपज प्राप्त की जा सकती है।

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