दालचीनी की खेती (Cinnamon) मे अधिकतम उत्पादन एवं फसल सुरक्षा हेतु ध्यान देने योग्य विशेष बिन्दु।

दालचीनी की खेती : दालचीनी (सिन्नामोमम वेरम; परिवार-लोरेसी) प्राचीन काल से ही प्रयोग किए जाने वाले मसालों में से एक ही और मुख्यतः तने की आंतरिक छाल के लिए इसकी खेती की जाती है । दालीचीनी का मूल- स्थान श्रीलंका है और इसकी खेती केरल और तमिलनाडु के पश्चिम घाट के निचले क्षेत्रों में की जाती है ।

दालचीनी की खेती

दालचीनी की खेती के लिए मृदा और जलवायु

दालचीनी एक सशक्त पौधा है और विभिन्न प्रकार की मिट्टी एवं जलवायु में पैदा होता है । भारत के पश्चिमी तट में कम पोषक तत्ववाली लैटेराइट एवं रेतीली मिट्टी में यह पैदा होता है । समुद्र तट से 1,000 मीटर तक की ऊँचाई पर इसकी अच्छी पैदावार होती है । क्योंकि यह मुख्यतः बारानी फसल है इसलिए 200-250 से.मी. की वार्षिक वर्षा इसके लिए अनुकूल है ।

दालचीनी की किस्में

भारतीय मसाला अनुसंधान संस्थान, कालीकट ने उच्च गुणवत्ता और अधिक पैदावार देने वाली दालचीनी की दो किस्में विकसित की हैं, जो भारत के विभिन्न क्षेत्रों में पैदा की जा सकती है- नवश्री और नित्यश्री । इन किस्मों की उत्पादन क्षमता क्रमशः 56 और 54 कि.ग्रा. सूखी छाल (Dry Quills) हेक्टेयर प्रति वर्ष है । नवश्री से 2.7% छाल का तेल, छाल में 73% सिन्नमेल्डिहाइड, 8% छाल ओलियोरेसिन, 2.8% पत्तों का तेल और पत्तों से 62% यूजिलोन प्राप्त हुआ । जबकि नित्यश्री से 2.7% छाल का तेल, छाल में 58% सिन्नमेल्डिहाइड 10% छाल ओलियोरेजिन, 3% पत्तों का तेल और पत्तों से 78% यूजिलोन का उत्पादन हुआ ।

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प्रवर्धन

दालचीनी का प्रवर्धन जड़कलमों (rooted cuttings), गुटी (Air layering) और बीज से उगाए गए पौधों (Seedlings) द्वारा किया जाता है ।

कलमें (Cuttings)

दो पत्तियों सहित लगभग 10 से.मी. लंबी अर्ध-सख्त कलमों को आई.बी.ए. (इन्डोल ब्यूटायरिक एसिड) के 2000 पी पी एम, कि दर से बनाए गए घोल में या जड़ उत्पन्न करने वाले हारमोन (सेराडिक्स-ए) में डुबाने के बाद, रेत अथवा रेत और नारियल जटा के पाउडर (1-1) से भरे हुए पोलिथीन बैगों में या छाया में तैयार की गई रेतीली क्यारियों में रोपना चाहिए । पोलिथीन बैगों में लगाई हुई कलमों को भी छायादार स्थानों में या पौधशाला में रखना चाहिए । इन कलमों की रोजाना 2-3 बार सिंचाई करनी चाहिए ताकि पर्याप्त नमी बनाई रखी जा सके और इन्हें मुरझाने से बचाया जा सके । 45-60 दिनों में कलमों में जड़े उग जाती हैं । अच्छी तरह विकसित जड़ों वाली कलमें रोपण मिश्रण से भरे हुए पोलिथीन बैगों में प्रतिरोपित करें और इनको पर्याप्त छाया में रख कर नियमित सिंचाई करनी चाहिए।

गूटी द्वारा (Air layering)

दालीचीनी में गूटी अर्द्ध–कठोर शाखाओं पर की जाती है । शाखाओं के अर्द्ध–कठोर भाग से छाल की परत हटाते हैं और इस भाग पर जड़ उत्पन्न करने वाले हारमोन (आई.बी.ए. 2000 पी पी एम या आई.ए.ए. 2000 पी पी एम) का प्रयोग करते हैं । हारमोन प्रयोग किए गए स्थानों के चारों ओर नमी युक्त नारियल जटा या नारियल की भूसी रख दें और इसे यथा स्थान रखने के लिए 20 से.मी. लंबी पोलिथीन शीटों से लपेट कर बांध दें । इससे नमी सुरक्षित रखी जा सकती है । 40- 60 दिनों में जड़े अंकुरित होती है । अच्छी जड़ों वाली गूटियों को मूल पौधे से अलग कर रोपण मिश्रण से भरे हुए पोलिथीन बैगों में लगाकर इन पौधों को छायादार स्थानों में या पौधशाला में रखिए और रोज़ाना दो बार सिंचाई कीजिए । वर्षा शुरू होते ही जड़ कलमों या गूटियों खेतों में रोपित किया जा सकता है ।

बीज से उगाई गई पौध (Seedlings)

दालचीनी का प्रवर्धन बीजों से भी होता है । पश्चिम तटीय जलवायु में दालचीनी में जनवरी में फूल आते हैं और जून-अगस्त में इसके फल पक जाते हैं । पूर्ण रूप से पके हुए फलों को या तो वृक्ष से तोड़ लेते हैं, या नीचे गिरे फलों को ज़मीन से इकट्टा करते हैं। फलों से बीजों को निकालते हैं और गूदा हटाने के लिए धो लेते हैं । इसके बाद तुरन्त ही इनकी बुआई की जाती है । बीजों को रेतीली क्यारियों में बोना चाहिए या रेत, मिट्टी और अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद (3.3.1) से भरे हुए पोलिथीन बैगों में बोना चाहिए । 15-20 दिनों के अंतराल में बीजों से अंकुरण होने लगता है । पर्याप्त नमी बनाए रखने के लिए नियमित सिंचाई करनी चाहिए । लगभग छः महीने तक पौधों को छाया में रखना चाहिए ।

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दालचीनी की खेती के लिए भूमि की तैयारी और रोपाई

दालचीनी की खेती में रोपाई करने का स्थान साफ कर लें और 3मी x 3मी. की दूरी पर 50 से.मी. x 50 से.मी. के आकार वाले गड्ढे खोद लें । रोपाई के पहले इन्हें कम्पोस्ट और ऊपरी मिट्टी से भर दें । दालचीनी की रोपाई जून-जुलाई में की जाती है,ताकि पौधे को अच्छी तरह बढ़ने के लिए पर्याप्त मानसूनी वर्षा मिले । प्रतिरोपण के लिए 10-12 महीने वाले पौधों या अच्छी जड़ कलमों या गूटियों का प्रयोग किया जाता है । हर गड्ढे में 3-4 पौधे या जड़ कलमों या गूटियों की रोपाई की जा सकती है । कभी कभी बीजों की बुआई मिट्टी और कम्पोस्ट से भरे हुए गड्ढों में भी की जाती है । प्रारंभिक वर्षों के दौरान आंशिक छाया देने से पौधे स्वस्थ रहते हैं और जल्दी बढ़ते हैं ।

दालचीनी की खेती खाद एवं कृषण क्रियाएं

दालचीनी की खेती में वर्ष में दो निराई, जून-जुलाई और अक्तूबर-नवंबर में करनी चाहिए तथा अगस्त सितम्बर में एक बार बौधों के चारों ओर भूमि की गुड़ाई भी करनी चाहिए । प्रथम वर्ष में 20 ग्राम नत्रजन, 18 ग्राम फोसफरस और 25 ग्राम पोटाश का प्रयोग करना चाहिए । जब पौधे दस साल के या उससे अधिक हो जाते हैं, तब 200 ग्राम नत्रजन, 180 ग्राम फोसफरस और 200 ग्राम पोटाश का प्रयोग करना चाहिए । उर्वरकों का प्रयोग दो समान मात्राओं में मई-जून और सितंबर-अक्तूबर में करना चाहिए । गर्मी के मौसम में हरे पत्तों (25 कि.ग्रा.) से पलवार करने की और मई-जून में 25 कि.ग्रा. गोबर की खाद के प्रयोग की भी सिफारिश की गई है ।

पौध संरक्षण

दालचीनी की खेती में लगने वाले रोग

पत्र –दाग एवं डाई-बैक

पत्र-दाग एवं डाई-बैक का कारण कोलेट्टोट्राइकम ग्लोइयोस्पोरियोडस (Colletotrichum gloeisporioides) है । पत्तों पर भूरे रंग के छोटे गहरे धब्बे दिखाई पड़ते हैं, जो बाद में आपस में मिल जाते हैं कभी कभी इस रोग से पत्तों में छिद्र हो जाते हैं और बाद में पूरा पत्ता रोग ग्रस्त हो जाता है तथा रोग तने तक फैल जाता है और पूरा पौधा सूख जाता है । रोग ग्रस्त शाखाओं की कटाई और 1% बोर्डो मिश्रण के छिड़काव से इस रोग पर नियंत्रण किया जा सकता है ।

पौध में चित्ती रोग

डिप्लोडिया स्पी. (Diplodia sp.) फफूँद के कारण पौध में चित्ती रोग होता है । यह रोग पौधशाला में ही पौध के तने पर दिखाई देता है । भूरे रंग के धब्बे फफूँद के कारण होते हैं, जो पौध के तने के चारों ओर घेरा बनाते हैं । परिणाम स्वरूप पौध मर जाती है । 1% बोर्डो मिश्रण के छिड़काव से इस रोग की रोकथान की जा सकती है ।

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भूरी चित्ती

भूरी चित्ती पेस्टलोशिया पामेरम (Pestalotia Palmarum) फफूँद के कारण होती है और यह भूरे रंग के छोटे धब्बे, जो बाद में भूरे रंग के हाशिए से घिरे स्लेटी रंग के हो जाते हैं । 1% बोर्डो मिश्रण के छिड़काव से इस रोग पर कबू पाया जा सकता है ।

दालचीनी की खेती में होने वाले कीट

दालचीनी की तितली

दालचीनी की खेती में पौधशाला और नये बगीचों को प्रभावित करने वाले कीटों में दालचीनी तितली सबसे प्रमुख है और सामान्यतः यह मानसून के बाद दिखाई पड़ती है । इसकी सूँडियाँ पूर्ण एवं अर्ध परिपक्व पत्ते खाती हैं । अधिक प्रकोप होने पर पूरे पौधे की सारी पत्तियाँ गिर जाती हैं और पत्तियों की शिराऐं ही शेष रह जाती है । व्यस्क ततलियाँ बड़े आकार की होती है व दो रूपों में पायी जाती हैं, इन में से एक के पंख काले-भूरे रंग के और उनके बाहरी भाग पर सफेद धब्बे होते हैं तथा दूसरी के काले पंखों पर नीले-सफेद निशान होते हैं । पूर्ण विकसित लारवा 2.5 से.मी. लम्बा होता है व इसका रंग हल्का पीला होता है । इसे नियन्त्रण के लिए नई उग रही पत्तियों पर 0.05% क्विनालफोस का छिड़काव करना चाहिए ।

पत्ती में सुरंग बनाने वाला कीट (Leaf miner)

दालचीनी की खेती में इस कीट (कोनोपोमोर्फा सिविका) का आक्रमण ज्यादातर मानसून काल में होता है और सामान्यतः पौधशाला की बौध इससे अधिक प्रभावित होती है । इसके व्यस्क पतंगे चान्दीनुमा स्लेटी रंग के होते हैं। सूँडियाँ प्रारंभिक अवस्था में हल्के स्लेटी रंग की होती हैं और बाद में गुलाबी रंग की हो जाती हैं । इसकी लम्बाई 10 मी.मी. होती है । ये पत्तों के ऊपर व नीचे वाले आवरण के बीच वाले उत्तकों को खा लेती है जिसके परिणाम स्वरूप पत्तों में सुरंगे बन जाती हैं, जो बाद में फफोले जैसी हो जाती है । पत्ते सिकुड़ जाते हैं और यह भाग सूख जाता है, जिससे पत्तों में बड़े छिद्र बन जाते हैं । नई पत्तियों के अंकुरण के समय क्विनालफोस 0.05% का छिड़काव से इसे नियंत्रित कर सकता है । कभी-कभी कई अन्य प्रकार की पत्ते खाने वाली सूँडियाँ और बीटल भी दालचीनी के कोमल पत्तों को खाती हैं । क्विनालफोस 0.05% के छिड़काव से इसकी रोकथाम की जा सकती है ।

दालचीनी की खेती में कटाई और प्रसंस्करण

दालचीनी के पौधे 10-15 मीटर तक ऊँचे हो सकते हैं, लेकिन समय समय पर इनकी काट-छांट करते रहना चाहिए । जब बौधे 2 साल के हो जाते हैं तब जून-जुलाई के दौरान इसे जमीन से 12 से.मी. की ऊँचाई में काट देते हैं । इसके ठूँठ पर मिट्टी तढ़ा दी जाती है । इस प्रकार ठूँठ से शाखाएँ निकलने लगती हैं । हर शाखा के लिए यही क्रिया दोहराई जाती है इस तरह पूरा पौधा 2 मीटर ऊँची झाड़ी का रूप धारण कर लेता है और शाखाएँ 4 साल में विकसित हो जाती हैं । पहली कटाई, रोपण के चौथे या पाँचवे वर्ष से शुरू की जा सकती है ।

केरल में सितंबर से नवंबर तक फसल की कटाई की जाती है । कटाई एक वर्ष छोड़ कर की जाती है एवं 1.5 -2.0 से.मी. तक मोटी और समान भूरे रंग वाली शाखाएँ छाल प्राप्त करने के लिए उपयुक्त होती हैं । छिलाई के लिए इसकी उपयुक्तता जाँचने हेतु एक नुकीले चाकू से तने का छिलका काटा जाता है । यदि छाल आसानी से अलग हो जाती है तो तत्काल कटाई की जा सकती है । जब तने 2 वर्ष के हो जाते हैं, तब जमीन के निकट से काट दिये जाते हैं । ऐसी शाखाओं से पत्तियों और ऊपरी-शाखाओं को तोड़कर अलग करते हैं और इन शाखाओं को बांध कर बंडल बनाते हैं ।

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काटी गई शाखाओं को 1.00-1.25 मीटर लंबे सीधे टुकड़ों में काटते हैं । इसके बाद छिलाई व खुरचाई करते हैं । छिलाई एक विशेष क्रिया है, जिसके लिए निपुणता और अनुभव की जरूरत है । यह विशेष रूप से तैयार किए हुए चाकू से की जाती है, जिसका एक सिरा मुड़ा हुआ होता है । बाहरी खुरदरी छाल पहले खुरज दी जाती है । इसके बाद खुरचे भाग पर पीतल या अल्युमिनियम की छड़ी से पालिश की जाती है ताकि छिलाई आसानी से की जा सके ।

छाल की एक ओर से दूसरी ओर तक लम्बाई में काटें । चाकू को छाल और लकड़ी के बीच में चलाते हुए छाल को आसानी से हटाया जा सकता है । सुबह काटी गई शाखाएँ उसी दिन मं छीलनी चाहिए । सारी छाल को इकट्ठा करके पूरी रात छाया में रखना चाहिए । इन्हें एक दिन तक छाया में और बाद में चार दिन तक धूप में सुखा लें । सूखने पर छाल सिकुड़ कर ‘क्वल’ (quill) का रूप धारण कर लेती है । छोटी क्विलों को बड़ी क्विलों के अन्दर रखते हैं ताकि संयुक्त क्विल बन जाए ।

क्विलों का वर्गीकरण- ‘00000’, सबसे बढ़िया दर्जे से लेकर ‘0’ सबसे घटिया वर्ग के क्रम में किया जाता है । क्विल तैयार करने के बाद बचे हुए छोटे टुकड़ों को ‘क्विल्लिंग’ (quilling) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है । अंदर की सबसे पतली छाल को सुखाकर फेदरिंग्स (feathering) के रूप में रखते हैं । घटिया बैतों की छाल छीलने के बजाय खुरचते हैं और इसको ‘स्क्रैप्ट चिप्स’ (scraped chips) कहते हैं । छाल के बाहरी आवरण को हटाए बिना इस छाल को खुरच लेते हैं और इसे ‘अनस्क्रैप्ट चिप्स’ (unscraped chips) के रूप में जाना जाता है । विभिन्न वर्गों की दालचीनी को पीस कर बना गया पाउडर बाज़ार में मिलता है ।

पत्तों और छाल का तेल आसवन क्रिया (distillation) द्वारा क्रमशः सूखे पत्तों और छाल से प्राप्त किया जाता है । दालचीनी के सूखे पत्तों को विशेष आसवन- यंत्र में बाष्पित करते हैं । एक हेक्टर के दालचीनी के बाग से लगभग 4 कि.ग्रा. छाल का तेल मिलता है । पत्तों एवं छाल का तेल, इत्र, साबुन, टूथ-पेस्ट, बालों में लगाने का तेल और चेहरे पर लगाने वाली क्रीम (face Cream) आदि के निर्माण में तथा दंत मंजन एवं मदिरा को सुगन्धित बनाने में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है ।

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